१६५ धर्म' नीति प्रभु भक्ति जुन साधु प्रीति जँह चित हित पर उपकार मैं ग्यान जानिये धृति - लक्षण धृत कहिये संतोष को सत्या तालु दुख को सुख करि मानई घोरजादि उदाहरण 'रसलीन' होइ । सोइ १८०५ ॥ विभाव | श्रनुभाव ॥७३॥ हारयौ मदन चलाइ सर सखि कर सेल यह पिक कहि' रोतो कहूँ कहा डरावत कौन नवावत जगत को फिरै को फिरै श्रपने दई जीव के लगाइ । श्राइ ॥ ८७७ ॥ माथ | बाँध दई है जीविका हाथ' ||८७८ || हर्ष - लक्षण हरष भाव पिय बसत' लखि मन प्रसाद जो' हो । मन प्रसन्न पुलकादि लहि जानत है सब कोई !!८७६॥ ८७५ - १. धरम (२, ३ ), २. प्रीति ( २, ३ ), ३. तह ( ३ ), ४. गान ( २, ३ ) । ८७७ – १. करि (२, ३ ) । ८७८ - १. साथ (१) । ८७६ – १. वस्तु ( १ ), २. हू ( २, ३ ), ३. जोइ ( २, ३ ), ४. लोइ - (2, 2), (2, 3), ( २, ३ ) । ८०१ - त्रर्म = वह कृभ्य, आचरण, व्यवहार या विधान जिसका फल शुभ या श्रेयस्कर हो । नीति = सदाचार जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए उचित बताया गया हो, आचरण के नियम । भक्ति= श्रद्धायुक्त प्रेन | साधु = संत, महात्मा, सज्जन । प्रीति = प्रेम, श्रद्धा । ८७६ – त= धैर्य | सत्या=सत्यता | ८७७-पर= बाण | ससिकर = चंद्रकिरण, सेज = बरछा, भाजा । रो ७८ - नवावत = नमन करता हुआ । दई = ईश्वर | ८७६ - पुलकादि = हर्ष आदि । ।।
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