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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३२२

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१७७ 'रसलीन' कान्ह बनाइ " सखी-सदन का मिलन कुमारिका, लखी गेह' में चोरमिहि चुनी मैं दई लै राघकहि ल्याइ । मिलाइ ॥ १४५ ॥ सूने सदन का मिलन धनि सुने घर' पाइ यो हरि लीन्हौं उर लाइ । सूने गृह लहि लेत हैं ज्यों धन चोर उठाइ ॥ १४६ ॥ फिरति हुती तिय हरि लखि उपबन उपवन का मिलन फूल के भूषन विपिन का मिलन पहिरि अतूल | कूल मैं' भई और ही फूल ॥ ९४७ ॥ हरि को लखि यहि राधिका ठहिराई यह भाइ । मनु तमाल तरु को गई पुहुपलता लपटाई || १६४८ || स्नान-स्थल का मिलन दोऊ खरबर न्हात श्ररु फिरि फिरि चुभकी लेत । परसि लहर जल परसपर सुरति' परंस सुख देत ॥ १४६ ॥ चुभकी लै लै मिलत श्ररु उठित दूरि नित जाइ । परस' कंप रोमांच इनि दुरधौ सरोवर न्हाइ ॥ १५० ॥ ६४५—१. ग्रेह (१), २. २ चोर मिहचुनी तैं (२, ३), २. राधिके (२, ३) । ६४६ – १. घरि ( २, ३ ), २. सो ( १ ), ३. लीनो ( २, ३ ) " ६४७- १. फूल मै ( २, ३ ) । ६४८ - १. कै ( २, ३ ) । ६४६ - १. सुरत ( १ ), २. परम ( २, ३ ) । ह५० - १. घरसि ( २, ३ ), २. इन्हि ( २, ३ ) । ६४५ - कुमारिका=अविवाहित १० से १२ वर्ष की कन्या । चोरमिहिचुनी = आँख मिचौनी का खेल । ३४७ – कूल = किनारा, समीप । ६४६ - सरबर = सरोवर, तालाब । परसि= स्पर्श करके । परसपर=परस्पर आपस मे । १५० - चुभकी = डुबकी । १२