१७६ 'रसलीन' पूर्वानुराग मध्य सुरतानुराग- उदाहरण जाहि बात सुनि कै भई तन मन की गति श्रान' | ताहि दिखाये कामिनी क्यों रहि है मो प्रान ॥ ६५६|| पूर्वानुराग मध्य वृष्टानुराग- उदाहरण श्राप ही लाग लगाइ हग फिरि रोवति यहि भाइ । जैसे आगि लगाइ कोउ जल छिरकत है हिये मटुकिया माहि मथि दीठि रई सो मो मन माखन लै गई देह दही सो' मान मे लघुमान उपजने का उदाहरण और बाल को नाउ' जो लयो भूलि कै सो श्रति ही विष श्राइ ॥ ६५७ ॥ ग्वारि । डारि ॥ ६५८ ॥ नाह । व्याल' सौ छलो बाल हिय माह ॥ ६५६ ॥ मध्यमान - उदाहरण पिय सोहन सोहन' भई भुवरिल धनुष उतारि । रस कृपान मारन लगी हँसि कटाछ सो नारि ॥ ६६०॥ ६५६ - १. श्रानि ( २, ३ 1 ६५७ - १ लागि ( २, ३ ), २. यह ( २, ३ )। ५८ - १. मटकिया ( २, ३ ), २. को ( २, ३ ) । ह५६– १. नाम ( २, ३ ), २. बाल ( २, ३ ), ३ ज्यौ ( २, ३ ), ४. छयो ( २, ३ ) । ६६० - १. हा है ( १ ), २. कृसान (२, ३)। ३५७–लाग लगाइ= स्नेह लगाकर । छिरकत = बिखेरती है । ९५८ - मटुकिया = मिट्टी की गगरी ग्वारि = ग्वालिन | ३५६–नाउ=नाम । ब्याल= सर्प । ३६० – सोहन = सुहावना, सुंदर लगनेवाला, सौगध । भुवरिस= काम जन्य क्रोध ।
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