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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३२५

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रसप्रबोध १८० गुरुमान - उदाहरण पिय हग अरुन चितै भई यह तिय की कमल अरुनता लखि की गति श्राइ | मन ललि दुति घटै बनाइ ॥ १६९ ॥ लहि मूँगा छवि' हग मुरनि यह मन लह्यौ प्रतच्छ । २ नख लाये तिय श्रनख पियनख छाये स्याम' जो मान जो मनाइये दै गुरमान छूटने का उपाय छोड़ाइये समता को कछू सो है दान ॥ पच्छ ॥ १६२॥ सुख दै सकल सखीन को करिके श्रापनि' श्ररि । समुझाइ । उपाइ ||६६३ || बहुरि छुड़ावै मान सो भेद जानि सब ठौरिउ || १६४ || मान मोचावन' बान े तजि कहै और परसंग | | सोह उत्प्रेक्षा ? जानिये बरनत बुद्धि उतंग ॥ ६६५ ॥ उपजै" जिहि" सुनि भावभ्रम सो प्रसंग बिध्वंस है बरनत कहिये यहि बिधि बात । बुधि श्रविदात ॥९६६॥ तिय को पाइ । प्रनतर उपाइ ||६६७॥ जो अपने अपराध सो रूसी पाँइ परे तेहि कहत है कविजन ε६२–१. छनि ( २, ३ ), २. अख इनै ( २, ३ ), ३०-०३. पियन छपाये ( २, ३ ), ४. पक्ष ( १ ) । ε६३ – १. साम ( १ ), २. छुटाइये ( २, ३ )। ε६४ – १. अपनी (२, ३ ), २. बोर ( १ ), ३. ठौर ( २, ३ ) । १६५–१. सुचावइ ( २, ३ ), २. मान ( १ ), ३. उपेष्या ( २, ३ ) । ε६६–१•••१. उपजि परै (२, ३), २. बितिक्रम ( २, ३ ) । ε६७ – १. तिहि ( २, ३ ), २. प्रनित ( १ ) । ३६२ - प्रतच्छु = प्रत्यक्ष, सामने । पच्छ=पक्ष । ३६३ – उपाइ = उपाय, व्यवस्था । ३६४ – औरि= ओर, तरफ। ठौरि= ( ठौर) स्थान । ९६५ - मोचावन = छुडाने के लिए । बान = श्रादव | ३६७ - रूसी = रूठी हुई । प्रनत = विनत ।