( १३ ) के लिये भी हिंदी हराम न थी श्रपितु उसकी उपयोगिता के कारण वह उसके उपयोग और प्रयोग का हामी था । यह उपयोगिता लोकमंगल तथा शासन की सुविधा के कारण थी । इसलिये उसके दरबार के फारसीदाँ लोग भी हिंदी और उसकी कविता के प्रति श्रादर भाव रखते थे । यद्यपि श्रौरंगजेब का संमान अत्यंत श्रालकारिक वासना दीप्त करनेवाली रचनाओं को प्राप्त न था, तो भी नीतिविषयक हिंदी कविता के प्रति उसमे समादर भाव था । इसी लिये 'वृ ंद' जैसे नीतिवान कवि का वह स्वागत और सत्कार करता था । भूषण के बड़े भाई चिंतामणि यदि शाहजहाँ के दरबार की शोभा थे तो भूषण से कभी श्रालमगीर का भी सबंध था। कालिदास, कृष्ण और सामत जैसे कवि उसके प्रशंसक थे । २ श्रौरंगजेब हिंदी का कवि था । 3 हिंदी के सुरुचिपूर्ण विद्वानों के प्रति उसे मोह था । उसके श्रमज दाराशिकोह का संस्कृत और हिंदीप्रम इतिहास की चर्चा का विषय है । उसका पुत्र श्रामशाह हिंदी के कवियों का परम भक्त था । श्रालमगीर के कारण इसके लिये ब्रजभाषा व्याकरण तोहगतुल्फहिंद की रचना हुई। इससे स्पष्ट है कि औरंगजेब भी ब्रजभाषा को उस समय की लोकशिष्ट और काव्य की भाषा मानता था । श्राजमशाह स्वय हिंदी का कवि था। शाहश्रालम, बहादुरशाह उनका प्रेम था । इनकी भी हिंदी के अच्छे कवि थे । ब्रजभाषा या हिंदी से भी मातृभाषा हिंदी ही थी। लालकुँवर का चहेता जहाँदारशाह 'मौज' नाम से रचना करता था । सैयद बंधुओं के समय मे भी हिंदी कवियों को पर्याप्त राज्याश्रय मिला । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हिंदी या ब्रजभाषा के काव्य को मुगलों का श्राश्रय प्राप्त था और वे उसे लोकभाषा के रूप मे प्रतिष्ठित तो मानते ही थे, हिंदी के कवियों को व्यापक सम्मान भी देते थे । इनकी देखादेखी उनके सामत और श्राश्रित राजा भी यही करते थे । इन कवियों के लिये उस युग मे इस श्राश्रय के अतिरिक्त जीविका का अन्य कोई साधन न था । यद्यपि इनमे १. संगीत रागकल्पद्र ुम । २. शिवसिंह सरोज । ३. मुलाकाते शिबली ।
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