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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३३१

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रसप्रबोध १८६ लखत होत सरसिज नमन आली रवि बे और । अब उन श्रनदचंद हित नयन करयो चकोर ॥ ६६६ ॥ चन्द निरखि सुमिरत बदन कमलबिलोकत पाई । निसि दिनि ललना की सुरति रही लाल हिय' छाइ ॥ १००० || बिछुरनि खिन के हगनि" मैं भरि असुंवा ठहरानि । श्ररु सकति धन गर गहन कसकति है मन श्रनि ॥ १००१ ॥ या पावस रितु मैं कहौ कीजै कौन उपाइ । दामिनि लखि सुधि होति है वा कामिनि की श्राइ ॥ १००२ ॥ गुणकथन - उदाहरण दिन दिन बढि बढ़ि' श्रइ कत देत मोहि दुख द्वंद । पिय मुखर सरि करि है न तू श्ररे कलंकी चंद ॥ १००३ ॥ जिहि तन चंदन बदन सलि कमल श्रमल' करि पाइ । तिहि रमनी गुन गन गनत क्यों न हियौ लहराइ ॥१००४ || उद्वेग - उदाहरण जरत हुती हिय' अगिन ते ता चंदन ल्याइ । बिजन पवन डुलाइ इनि दीन्हों" अधिक जराइ ॥ १००५॥ १००० - १. हग ( २, ३ ) । १००१ - ११. बिठुरन खिनि के हगन ( २, ३ ), २. गल ( २, ३ ), ३. ककत ( १ ) । १००३ - १. घटि ( २, ३ ), २. सुख ( २, ३ ), ३. सठ ( २, ३ )। १००४ - १. जमल ( २, ३ ), २००२. हिये सियराइ ( २, ३ ) । १००५—१. हो ( २, ३ ), २. अग्नि ( २, ३ ), ३. लाइ ( १ ), ४. विजैन ( १ ), ५. दीनों ( २, ३)। १००० --- ललना=स्त्री, कामिनी । १००१ गरगरदन | गहन = गहना । १००३ —— कत = क्यों । सरि=समता, बराबरी । १००४ – सहराइ = कंपित होता है । १००५ --- बिंजन = ( व्यंजन ) पंखा ।