रसप्रबोध १८८ मन की बात न जानियत श्ररी स्याम को' गात । तो सों प्रीत लगाइ के पीत होत नित जात ॥ १०९२ ॥ जड़ता - उदाहरण नेक न चेतत और विधि थकित भयो सब मृतक सँजीवन मंत्र है वाहिर तिहारो तुव बिछुरत ही कान्ह को यह गति भई ठाढ़े रहत पखान ते राखै मोर दसदमा - उदाहरण गाँउ । नाँउ || १०९३ ॥ निदान | पखान ॥ १०९४ ॥ ॥ बिदित बात" यह " जगत में बरन गये प्राचीन । पिय बिछुरे सब मरत हैं ज्यौं जल बिछुरत पाती - वर्णन मीन ॥ १०१५॥ बिथा कथा लिखि' अंत की अपने अपने पीय । पाँती हैं और सब हौं दैहौं यह जीय ॥ १०१६ ॥ पिय बिन दूजो सुख नहीं पाती के परिमान' । - जाचत बाचतर मोद तन बाँचत बाचत प्रान ॥ १०९७ ॥ नैन पेखबे को चहै प्रान धरन को हीय । लहि पाँती भगरधौ परयौ अनि छुड़ावै पीय ॥१०९८६ ॥ १०१२ – १. के ( १ ), २. २. भये जिन ( २, ३ ) । १०१३ - १. भयउ ( १ ), २००२. मृत्यु है जाहि ( २, ३ ) | १०१५–१ ་*१. अहै या ( २, ३ ), २. बीलुरे ( २, ३ ) । १०१६ - १. तिय ( १ ) । १०१७ - १. परमान ( १ ), २. यांचत ( २, ३ ) । १०१८ - १० झरौ (२, ३ ) । १०१२ -- पीत = प्रीति, नेह । पीत= पीला | १०१३ - मृतक सजीवन =मरे को पुनः जिलानेवाला । नाउ=नाम । १०१४ -- पखान = ( पाषाण ) पत्थर । पखान=पंखे | १०१५ -- बरन गये वर्णन कर गये । मीन = मछली । प्राचीन=पुराने विद्वान । १०१८ – पेखबे = देखने |
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