( १४ ) विस्तार भी कम व्यापक नहीं से अधिकतर गुणग्राहक थे तो भी श्राश्रय श्राश्रयदाता की रुचि के कार्य के लिये श्राश्रित की स्वतः बाध्य कर देता है। मुगल पुरुषार्थी योद्धा थे, साथ ही साथ कला और निर्माण में नव रुचि रखनेवाले मनस्वी और श्रोजस्वी शासक भी । युद्ध और सघर्ष का जीवन मनोरजन, सुख सुविधा और विलास से युद्ध की कटुता मिटाना चाहता है । ऐसी स्थितियों मे कवि उन श्राश्रय- दाताओं का ध्यान रखता था और ललित एवं कलात्मक रचनाओं द्वारा उनका मनोरंजन भी करता था । औरतों के प्रति मुगलों में सम्मान की भावना बड़ी व्यापक थी, इसलिये उनके हरम का था । इसी लिये काम की ओर भी उनकी विशेष रुचि थी । उनके दरबार मे गाए जानेवाले संगीत तथा उनकी स्वयं की रचनाओं से यह स्पष्ट झलकता है कि वासना के प्रति उनमे मोह था। उनमें ही नहीं बल्कि प्रत्येक लड़ने- भिड़नेवाले सैनिक मे यह व्यामोह पाया जाता है । इसलिये कामवासनामयी उद्दाम रचनाएँ उन्हें रुचती थीं और कवि, संगीतज्ञ और चित्रकार भी उनकी रुचि का आदर करता था । ऐसी स्थिति में यह मानने मे किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि राज्य और अमीरों के श्राश्रित कवि स्रष्टान्न रहकर कलावंत की कोटि के हो गए थे, जो श्रलंकरण द्वारा चित्ताकर्षण के लिये बारीक कारीगरी करने मे रियाज करते थे । जीवन की सहज सरल अभिव्यक्ति के प्रति वे प्रायः उदासीन मिलते हैं । इन अमीर उमरावों के अतिरिक्त ब्रजभाषा के कवियों के श्राश्रयदाता विभिन्न सप्रदायों के मंदिर और मठ श्रादि थे । वैष्णव माधुर्य भावना में शील, शक्ति और सौदर्य मे श्रास्था रखनेवाली रामभक्ति भी सराबोर हो चुकी थी। मंदिरों के महथ और पुजारी कनक और कामिनी की उपासना से छलिया कृष्ण और रसिक राम को रिझाने का यत्न इसलिये भी कर रहे थे कि इसमें उनका दैहिक तथा भौतीक कल्याण था । मंदिरों श्रौर मस्जिदों पर चढ़ी श्रद्वाविलसित संपत्ति का उपभोग और उपयोग वे सामंतों की ही भाँति कर रहे थे; भले ही उनका बानक उनसे कुछ विलग था । सर्वत्र से निराश जनता भगवान् को एक मात्र शरणस्थली और इन मंदिरो तथा मठों को त्राणगृह तथा इनके उनके चरणों पर अपना पेट काट करके भी प्रस्तुत करती थी । पर वहाँ माधुर्य रस भोग की महंथों को भाग्यविधाता मान रागभोग, पूजा के लिये साधन दैहिक धारा में रासलीला के
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