रसप्रबोध २०० वीर रस के स्थायी भाव उत्साह का उदाहरण सत्य दयारत' दान को जब अवसर उदय करत हैदर हियौ हरखहि श्रगे नियराइ | श्राइ ॥ १०७८ ॥ वीर रस का उदाहरण चतुर्विधि जग प्रकट भे सत्त' दयारत दान | बीर चारि जग प्रकट २. घरम े तनय सिव राम बलर इत्यादिक ते जान ॥ १०७६ ॥ प्रगटे' चारो' बीर जे' चारि पुरुष को पाइ । सो चारो पूरन भये हैदरनतन" मैं आइ ॥ १०५० ॥ सत्यवीर का उदाहरण तिनि सर नाये पगन पर जिन जिय धरो मरोर " | करयौ नबी ने जगत सब एक सत्य कै जोर ॥ १०८१ ॥ हैदर ते जीतै न धरमहि, ते जय होत है पापहि ते भज्यौ बहत्तर बार जो जुद्ध माहि' कोउ यह जानत सब कोइ । छय होइ ॥ १०८२ ॥ मुख मोरि । 1 हैदर ने मुख बोलि हित दियो राज तिहि छोरि ॥। १०८३ ॥ १०७८ - १. दयारन ( १ ) । १०७६-१. सॉच ( १ ), २२. धर्म तनै शिवराम बलि (१) । १०८० - १. प्रकट जे ( २, ३ ), २. चायो (२, ३), ३. जो ( २, ३ ), ४. चारी (२, ३ ), ५. दुरत न मन मै ( २, ३ ) १०८१ – ११. जिनि जिनि धरो मरोरि ( २, ३ ), २. नवीनो ( २, ३ ), ३. सोरि ( २, ३ ) । १०८३ – १. मॉह ( १ ) । १०७६ - प्रकट = प्रत्यक्ष । १०८१ - नवी = ईश्वर का दूत, पैगम्बर, गुलाम नवी 'रसलीन' | १०८२ - हैदर = हजरत अली ।
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