रसप्रबोध २०४ परिपोषक आश्चर्य को अद्भुत रस लक्षण श्रद्भुत रस वहि जानि । नई बात कछु देखि सुनि उपजत है नित श्रानि ॥ १०६६ ॥ बिनु बूझे' जो चकि रहै सोइ जानि अनुभाव | पीत बरन अरु देवता ब्रह्म चित्त मैं ल्याव ॥११०० ॥ जराइ । लाइ ॥ ११०१ ॥ अद्भुत रस के स्थायो भाव श्राश्वर्य का उदाहरण पूँछि जारि कै पवन सुत दी सब लंक हिये' राछसन के दयौ श्रवरिज' सो धा ल्याइ सँजीवनि मूरि जब ज्यायो लछमन सब राक्षस चकृत भए यह श्रचिरिज' को जो दल चढ़ि लंका गयो आयो रावन सो लरि कै सरि को करै द्वै लरिकन सो हारि ॥ ११०३ ॥ प्रगट देखियत जो सकल जग के पोषनहार' । ठाढ़े हाथि पसार कै माँगत बलि के फेरि । हेरि ।। ११०२ ॥ मारि । द्वार ॥११०४ ॥ शान्त-रस लक्षण परिपोषक निरवेद को सांत कहत है सोइ । । उपजनि याकी गुरु कृपा देव कृपा तें होइ ॥ ११०५ ॥ १९६६ - १. जिहि ( २, ३ ) । ११००– १. पूछे ( १ ), २. थकि (१), ३. वहै (२, ३), ४. लाव (२, ३) ११०१ – १. हियो (२, ३ ), २. अचरज ( २, ३ ) । १९०२ - १. सजोवन ( २, ३ ), २. श्रचिरज ( २, ३ ) | ११०३ – १. है ( २, ३ ) । ११०४ - १. पालनिहार ( २, ३ ) । ११०० - चकि = चकित, चौंक | ११०२ - हेरि = देखकर । ११०३ – द्वै लरिकन = राम के दो लड़के लव और कुश । ११०१ – निरवेद = (निर्वेद ) शांत रस का स्थायी भाव, वैराग्य ।
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