२०६ 'रसलीन' रसजति रस- वर्णन होत हाँस सिंगार ते करुन रौद्र ते जान । बोरजनित श्रद्भुत कह्यौ बीभतल हित भया न ॥ ११३७ ॥ रस - शत्रु - वर्णन रिपु बीभत्स सिंगार को अरु भय रिपु रस बीर । प्रस्तावक जो जैसो गुन करत है तैलो पावत ॥११३८॥ भोग । बड़े चातुरन ते हगन मोत काजर भयो माँगन चख मुख कारज के उचित श्रधर सखी बड़े न पान के ॥ जोग ॥ १९३६ ॥ पैयत' भाग | मीत सुहाग ॥ ११९४० ॥ हाथ निबाह । रे मन तेरो जगत मैं विधि के दुखी मीन तन धरति हैं नित चुपरो को' चाह || १९४१ ॥ मैं जब देखों मुरज लौं नीच नरन को बात । ज्यों ज्यों मुख मैं मारिये त्यों त्यों बोलत जात ॥११४२ ॥ है सत्रुन के भिरत य होत लघुन को ज्यों कुकुर' कूकुर लरै कौवा पावत सान्तरस को प्रस्तावक चाउ । दाउ || १९४३ ॥ सखि न धरत निज देत सो रंग रूप परवेष | त्यों ही श्राप श्रभेष पुनि देत' सबन को वेष ॥ ९१४४ ॥ ११३६ – १ जैसे ( २ ), - ११४० - १. पैषत ( २ ) । ११४१ – १. को ( २ ) । ११४३ – १. कूकर ( २ ) । ११४५ - १. देख (२) । २. राज ( २ ) । ११३७ -भयान = भयानक । ११३६ चख = चखना, आँख | पान=पीना, ताम्बूल । - ११४१ – चुपरी = स्निग्ध पदार्थ । - ११४२ - मुरज = मृदंग, पखावज । १४
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