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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३७२

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( २२८ ) दो० पृष्ठ दो० पृष्ठ यो पिय परदेस ते ४५४ लंबन अंकित विषै १०५५ ६० उतमादिक मै गुनत ५६० ११३ १६६ उत्तमादि सो मिलि वहै ४६० ६७ लंबन चुंबन परस ६६६ १३३ उत्तिमादि को बूझिये ४८८ ૬૭ ११७ उत्तिम ढिग है कैहिये ६१७ १७२ ३४ उत्तिम मनुहारिन करै ५५५ १०८ १४७ ८८ लंबन मै नायिका ६०४ लिगन चुंबन करत १५६ श्रावत मदन महीप के ७७६ श्रावत सुनि परदेस ते ४४६ श्रावत ही तिय मान तकि ५५८ १०८ श्रावन कहि आयो न पिय ३८४ ७७ श्रावन सुनि घनस्याम की ४५० ८६ इ ६५ १०१ इंद्रानी दिव्या कहै ४७६ इंद्ररूप गुन ग्यान अरु ५१७ इक तिय रति अनुकूल है ५२११०२ इक पूरुब अनुराग रु ६५३ १७८ इक बनत है बिनय तकि ७८६ १४६ इक भूषन सखि सजति है ३७५ ७५ इक सुकिया द्वौ पर किया ४८६ इत ते उत उतते इतै इत निज कुल की लाज १११६ २०६ इत प्रभु की श्राज्ञा नही १११८ २०६ इत मन चाहत पिय मिलन ६६५ १८५ इत लखियत यह तिय नही ६५११७८ इन काहू सेयो नही ६६६ ६७ १६७ १८१ ३६ w m ११३ इनि भेदन मै जो कोऊ १६३ इन्द्रादिक ये दिव्य हैं ५८८ इति उति द्रोउ र झुकि १९६ २६ इहै भेद इनि दुहुन मै ३३५ उ ५१ उदाहरन इन दुहुन के १०५० १६४ उद्बुद्धादिक दुहुन मै २४८ उपजै जिहि सुनि भाव भ्रम ६६६ १८० उपजै जेहि नर निरखि कै ३१५ १०१ १३ उपजै थाई जाहि लै ५० उपपति तीनि प्रकार पुनि ५३७१०५ उपमानादिक ते कछू ८५२ ऊ ऊढ़ अनूढा दुहुन मै २४२ ऊढा ब्याही और सो २१३ ए १६० ५० ४५ २४ १२० एक ओर थी प्रीत अरु ११३२ २०८ एक ठौर बसि प्रेम जो ३१६ ६४ एक मते विखन्ध सो २०७ एक सखी इक छौहरै ६२४ एक सखी कर लै छरी ७६८ एते हैं रंगलाल ते २४४ ऐसे कामिनि लाज ते ३६१ ऐ १४६ ५० ७८ ऐसी विधि सब जगत मे ११४७२१० ओ ६८ प्रोप भरी निज रूप छबि २३२ ४८ श्र उग्रसत ही तुव उरज रु ६० २१ उग्रताइ परसन्नता १०७७ १६६ और देत हैं दीप सब १०३७. १६२ और बाल को नाउ जो ६५६ १७६ उचित न इन नारीनु मैं ३६४ ७३ औसधीस सँग पाइ रु ६७५ १३१