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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३७४

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( २३० ) दो० पृष्ठ दो० पृष्ठ ७२ ४८ कौनहु हेतु न श्रावही ३५६ १२८ ७५ ४४ काह भयो नथ लौ तजे २३३ काह भयौ है कहत हौ ६६६ किती रूप रु गुनभरी ३७४ किते सप्तरिषि लौ फिरत ७८३ १४८ किन विचित्र यह खेल २०७ किलकिचित रोदन हॅसन ७१७ १३७ क्रिय विदग्ध अरु बोध कौ २६५ ५४ क्रिय विदग्ध करि चतुरई २६६ ५४ कीजै सुख घनस्याम हौ ६४१ १२३ पिय हियहि लगाइ १४५ कुच कुमति चंद्र प्रति द्यौस बढि ७७२१४७ कुलदनि के संग पकरि कै ५४३ १०६ कुलटा छुटि जो भेद हो ४८३ कुलटा ताको जानिये २५१ ३२ ६६ ख खटक रहौ चितक जौ ६६७ १८५ खरी गोर रही सबै ५६५ १०६ खाइ चुनौती को गयो १०६४ १९७ खिन कुच मसकति खिनि लजति ७३४ १४० खिन मुकुरति है ढीठ है १४१ ३१ खिन हरि ढूँढत श्राप मैं ११०६ २०५ खिनिक होत तन मै पुलक ८६३१६८ खिनि खिनी घरि को काढि तिय २७० ५५ ५२ खिनि चूमति खिनि उर धरति केसर श्राड लिलार दै ७८१ १००६ १८७ १४८ केहि बिधि तिहि उर ७३५ खिनि पिय मन खिनि पिया १४० कैसी बिधि चमकत हुती ५७० ११० ६०२ ११६ कोउ श्रसाध्यादिकन को २२२ खिनि रोवति खिनि बकि उठति ૪૬ कोउ उभकत उछरत कोऊ ६८११३१ कोऊ बरने पुरुष जसु ८७४ ६०६ १७१ १६४ को चतुराई जो न हौ ३५० कोप करै जो ब्यंगजुत १८५ को भो को कुल लाज यह ११२४२०७ को है माली चतुर जिन २७७ ५६ कौतुक रचि बन उठि चले ७४२ १४१ कौन म्यौ छबि सो मरो ६०२१६६ कौन जतन करि राखिये ५४६ १०६ कौन नववित जगत को ८७८ कौन भाँति वा ससिमुखी ६६६ कौन महावत जोर जिन २७८ कौन मानुषी जेहि लिये ६३६ गई बाग कहि जाति हौ ३३७ गछितपतिका जाहि पिय ३६१ गजगौनी तुव गुन चितै १४४ गने सकल ये भेद जब ५६१ खेलति ही गुडिया घरी ६० खेलन बैठी सखिन संग ३८८ २२ ७६ ७१ ग ३६ ६६ ७३ ३२ ११४ १६५ गये बीति दिन बिरह के ४५८ गरब कोटि राखै तऊ ३१० ६१ ६३ १८५ गरबन उपजत है तियहि ३३६ ६६ ५६ गवन समै पिय के कहति ४३८ ८७ १२३ कौन हुँ हित संताप तिय ७४० १४१ गहत बॉह पिय के अलि १५२ गावति है सुरताल सो २३५ ३३ ર