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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३८०

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( २३६ ) दो० पृष्ठ दो० पृष्ठ ध धनि सूने घर पाइ यो ६४६ १७७ धनी मित्र श्रागमन सुनि ४५१ ८६ निकसत जावक भाल पर निकसत षटरितु मै बहुरि २०७४ १६६ धनुष बान दोऊ नए १०२१ १६० ६६४ १३३ धरति न चौकी नगजरी ८१ १६ धरति न धीरज काम ते १६७ ३६ निकसत ही पट नील ते ८३२ निकसत ही पीछे परत ३७० १६२ ७४ धरे बियोग सिगार मै ६८७ १८४ निक्सन को अरि श्रम १०८७ २०१ धरे रूप गुन धन मनो ५१६ १०१ निकसि तियनि के जाल सो धर्म नीति प्रभु भक्ति ८७५ ध्यान सोच श्राधीनता सू ८३१ धाइ धाइ लखु कौन यह ६२ धाम सेज रागादि मिलि ६६५ धीर तू श्रादिक भेद पट २०६ वीर प्रधान लहै कहाँ ५८३ ४४ ११२ १६५ ७८२ १४८ निज काँधे तिय बॉह धरि ८६० १६७ १५७ निज घर श्रायो रसिक तजि ४०४ ८० २१ १३३ निज तन जलसाई रहत ६४७ १२४ निज दुति देह दिखाइ कै २१२ ४५ धीरादिक मै मूल है १७० ३७ निज पति रति को चिह्न ३३३ ६८ १३१ १६५ न ३८१ १०२ धीरा रिस रति खिन करै २०१ धूप चटक करि चट रु ६७६ धृत कहिये संतोष को ८७६ नख सिख करति सिंगार तन नबी हुते जग मूल पुनि ८ नये बसन जब हौ सजौ ५२२ नये रसिक देखे नये ३२४ नये रसिक ये गनति हैं ८३५ नवला मुरि बैठनु चितै ११० नवहॅू रस को जब भयो २४ ६५ निरखिनिरखि निहि चित्र १५७ २५ निरखि निरखि तिय की बिथा नहि सजोग बियोग जह १०४६ १६४ निरखि निरखि प्रति दिवस ४२ निज रस पूरन होन लौ ८२६ १५६ निजानन्द गुनगान लहि ११०७ २०५ निजु चावन सौ बैठि कै ६४१ १७६ निजु ते कछु गुन भये ८४० निपुन होइ जो सकल बिधि १५८ ७६ ५६८ ११० ४ निरखति ही जिहि नारि के ७४ १७ ६०१ ११६ ८ २१ १७३ नाइ नाइ जेहि चषक मे ३०६ ना पावत गुरू ज्ञान ते ११४८ २१० नारी नर करत है ७०४ ६२ ३६६ ७४ निलज निठुर निज श्रारथी १३५ ५६१ १०६