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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३९४

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥ मंगलाचरण राधापद' 'बाधाहरन साधा करि रसलीन । अंग अगाधा लखन को कीन्हों मुकुर नवीन १|१| सो पावै' या जगत मों' सरस नेह करे भाय । जो तन मन तें तिलन लौं' बालन हाथ विकाय || २ || बार-वर्णन मोर पच्छ' जो सिर चढ़े बारन तें अधिकाय । सहस चखन लखि धनि कचन परे मान छिन पाय ॥ ३ ॥ बेनी - वर्णन बेनी बधि इक ठौर है श्रहि सम राखत ठौर । बिथुरि चैवरि से कच करत मन बिथोरि घरि चौर ॥ ४ ॥ १ – १. १ – ( २, ३ ) मे नहीं है । २-- १ - पावत ( २ ), २ में (१,३ ), ३-के (३), ४-लो (१) । ३ - १ -पक्ष ( ३ ), २-यो ( ३ ), ३ - तत्र ( २,३ ) | - ४ - ( २३ ) मे नही है । १ – साधा = सिद्ध किया । आईना | अगाधा = प्रथाह, दुर्बोध | मुकुर = दर्पण, २ – सरस = रममय । भाय =भाव, श्राशय, श्रथं बिकाय= वशवर्ती होकर । 1 ३ – चखन=श्रॉखें | कचन=बाल | मान= श्रादर, प्रतिष्ठा । - 1 ४ - बेनी = चोटी । श्रहि = सर्प । बिथुरि= बिखरे हुए | चॅवरि = बालों का गुच्छा | चौंर= चॅवर, झालर ।