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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३९६

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२५३ 'रसलीन' यो बाँधति' जुरो तिया पटियन को चिकनाय । पाग चिकनिया सीस की यातें रही लजाय ॥ १० ॥ पाटीयुत मॉग- वर्णन माँग लगी ते बधिक तिय पाटी टाटी भोट | दोऊ हग पच्छीन को हनत एक ही चोट ॥ ११ ॥ श्ररुन' माँग पटिया नहीं मदन जगत को मारि । अमित फरी पै लै घरो रकत भरी तरवारि ॥ १२ ॥ भाल - वर्णन पाटी दुति जुत भाल पर राजि रही यहि लाज । श्रसित छत्र तमराज जनु घट्यो सीस द्विजराज ॥ १३ ॥ वा रसाल को लाल किन देखत होंहि निहाल । जाहि भाल तकि बाल सब कूटति हैं निजु भाल ॥ १४ ॥ जोरि सकत रसलीन तिहि भाल साथ को हाथ । चद कलंकी कर दयो' बिधि सोहाग जिद्दि माथ ।। १५ ।। १० - १ बाधत ( ३ ), २ – त्रिया ( ३ ), जाते ( २, ३ ) ५ – लजाइ (३) । ३ - - चिकनाई ( ३ ), ४- -- १२- १ - लाल ( १ ), २ – मार ( १ ), ३ – तरवार ( १ ) । है १३ - १ - राजत है ( २, ३ ), २ – मनु ( १ ) । १५ - १ - कैदियो ( ३ ), २ – सुहाग ( ३ ) | १० - पटियन = मांग । पाग = पगडी । चिकनिया = चिकन की, ( रेशम एव सोने के तार से बुना हुआ महीन बस्त्र ); छैला, बाका । ११ - बधिक = बहेलिया, बध करने वाला । टाटी=बॉस की फट्टियों, घास- फम एवं सरक्डों से बना हुआ डोचा जो परदे के लिए बनाया जाता है, टट्टी, चिक । श्रोट=श्राड | चोट=मार | १२ - श्रसित=काली। फरी=ढाल । रकत= रक्त. खून । १३ - जुत= युक्त | भाल= ललाट । राजि=जकीर पक्ति | छत्र= छाती, छतरी । तमर ज= सूर्य, चंद्रमा द्विजराज = ब्राह्मण, वद । • १४ - किन = क्यो नही । निहाल = सब प्रकार से सतुष्ट होना, प्रसन्न होना । कूटति हैं = पटकती हैं, कोसती है। भाल= भाग्य | १५ - मोहाग=सिंदूर, श्रहिवात, सौभाग्य ।