सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४११

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

अंगदर्पण मुख-बास-वर्णन २६८ • अगर तर के नगर में कहूँ रही नहिं चाह । बगर बगर सब डगर में तुव मुख बास प्रवाह ॥ ८२ ॥ नथ मुकुतन के फलक में मो मन लह्यो प्रकास । करत नाकबासी मुकुत श्रासु तिया मुख बाख ॥ ८३ ॥ भए, चिबुक-वर्णन करन े, बवरे श्रम्ब निदान । कोइ सुख पाक पिरान ॥ ८४ ॥ चिबुक - गाड-वर्णन आए ठोढ़ी सर कोई जर कोइर मन पारा हग परयो चिबुक के गाड़ में, कूप तें उफन बाल मुख छाहि । कबहूँ निबरत नाहिं ॥६५॥ चिबुक - तिल वर्णन अंध भवन जल में धसें जे हरि केलि निधान । . तीय चिबुक तिलके पर्ने लागे चुबकी खान - । ॥८६॥ ८२–१०·१–अगर बगर की जगत मे काहू रही न ( ३ ), इसका क्रम ८३ के बाद है । - ८३ – १ – झुनक ते ( ३ ), २ - श्रास ( ३ ) । ८४ – १ – श्रयो ( २, ३ ), २ – सरिकरन ( ३ ), ३ – वोरे ( ३ ), - ४ – कायर ( ३ ), ५.५ कौह पाकि पियरान ( ३ ) । ८५- १ – छाह ( १ ), नाह ( १ ) | ८६-१--मो ( ३ ), २ - बोलि ( २, ३ ), ३.३ - तियते चुबकी के परे लागे चिबुकी बान । ८२-बगर बगर = घर घर डगर= राह, रास्ता । बास=सुगध | ८३ - लह्यो = प्राप्त किया । श्रसु=शीघ्र । ८४ -- ठोढ़ी-ठुड्डी । कोइर = कोयल । सुख = आराम, सुखकर । पाक = पककर, पराकर 1 पिरान = पीताभ, पीले । ८१-- पारा-चाँदी के समान उज्वल एक चंचल द्रव । उफन=उबलकर | चिबुक = ठुड्डी | ८६ -- केलि = क्रीडा, रति । निधान = श्राश्रय, घर । चुबकी = डुबुकी ।