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२८७ 'रसलीन' अंग अंग को रूप सब यामें परत लखाय' । नाम अंग दरपन घरयों याही गुन ते ल्याय ३ ॥ १८० ॥ सत्रह सौ चौरनबे सम्वत में अभिराम | यह सिख नख पूरन कियों ले श्री प्रभु को नाम ॥ १८९ ॥ ॥ इति श्री सुकवि सिरमौर रसलीन बिलगिरामी विरचित श्रंगदर्पण समाप्त || १८० - १ – के ( ३ ), २ – लखाइ ( ३ ), ३ –लाइ ( ३ - १८१ - १ - सोरह ( १ ), २ – या ( ३ ), ३ – मुख (३) । - १८० --- परत पडता है । अंगदर्पण = इस पुस्तका का नाम । १८१ – सिखनख = सिर से पैर तक के सभी अम ।