फुटकल कवित्त ३०७ पुन. स्तुति शाह लद्धा बिलग्रामी देखत ही दरबार शाह लद्धा जू को सुख श्रखिन को भए और तन पुरुसत्त' पाए । स्रवन को भयो सुख नाद स्तुति सुनें तें और नासा सुख भयो जस गंधन' पाए । रसना भयो है सुख श्रायत परसादहि अच्छो कहाँ लौं बखानों श्रबलै सुखदै गनाए । जैसे इंद्र वन' सुख पाए रसलीन तैसे चाहो मन मेरे ^ निस- दिन सुख छाप ॥ १७॥ पुनः स्तुति शाह लद्धा बिलग्रामी नूरानी दरबार शाह लद्धा जू को नित चित देत श्रनंद । दिन-निल देखत पंथ तहाँ को जहाँ न सूरज चंद ॥ बिनय करत रसलीन दुवारे काटे जग के फंद । दुख दंदन के तिमिर हरन को दीजे जोति श्रमंद ॥ १८ ॥ पुन. स्तुति शाह लद्धा बिलग्रामी ईमान दीन को जो तू चा है मन तो चल देख साह लद्धा जू के चरन । रौसन दोऊ जहान जिंद पीर सुर ज्ञान जाके देखे ही से दृष्टि दालिद्दर हरन ॥ १६ ॥ स्तुति शाह सैयद बरकत उल्लाह बिलग्रामी चहुँ दिलान बाग बने सुंदर तरु बनें मन चीते फल देत रीत पारजात के' । । १७. ( १ ) भये । ( २ ) परसत । ( ३ ) सुगंधहि, जसगधहि । ( ४ ) । इद्रीन, इंद्रियन । ( ५ ) रहे । १७. पुरुसत्त = पौरुष शक्ति । १८. तिमिर : = अधकार | १६. रौसन - प्रकाशित | दालिद्दर = दरिद्रता ।
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