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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४४८

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३०८ ४ 3 ताके मध मंद यह अनूप जोति रूप सोहै पंथ को दिखैया श्री बतैया बात घात के | सकल कलेस दुख कलह बिमुख कर त्यावत बिपख सुभ गति सुख सात के" । श्रानंद उछाह लहै भूल जात मुक्ति चाह देखे दरगाह यह साह बरकात के ॥२०॥ स्तुति शाह यासीन बिलग्रामी 1 रसलीन माला हाथ घर गुन गन' जपै सदा मन, लागी है लगन तुव सुमिरन लीन है । देव श्र अदेव दब जात सुनें नाम जब, धरन सरन सब नरन को दीन है । अष्ट सिद्धि नव निधि पावत हैं बाल बृद्ध, पूरन प्रसिद्ध बुद्धि बेद बिधि कीन है । देखत प्रबीन जाके होत हरि सूरत यासीन मानो सूरत यासीन है ॥ २१ ॥ स्तुति मीर तुफैल मुहम्मद रसलीन, देस बिदेसन के ' सब पंडित सेवत हैं पग सिष्य कहाई । आयो है ज्ञान सिखावन को सुर को गुरु मानुस रूप बनाई‍ । बालक बृद्ध सुबुद्धि जहाँ लग बोलत हैं यह बात सुनाई' । गौ मन मैल गहे सुभ केल तुफेल तुफेल मुहम्मद पाई" ॥२२॥ २०. ( १ ) पारिजात की । ( २ ) की । ( ३ ) कलकहि । ( ४ ) सुझ । ( ५ ) की । ( ६ ) की । २१. ( १ ) गन गन। ( २ ) नवौ, नौ । । २२. ( १ ) ये । ( २ ) कहाए । ( ३ ) बनाए । ( ४ ) सुनाए । ( ५ ) पाए । २०. रीत = समान । पारजात = कल्पवृक्ष । बिपख = विपक्ष, विरुद्ध | दरगाह = मकबरा । २१. यासीन = कुरान की एक सूरत । २२. तुफेल = जरिया, संबंध ।