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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४५०

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३१० रसलीन लाल हीरा मूठ में बिराजे सुभ रूप जात, भुजनि१ की भाई छबि चित्त ठहरानी है । देस देस जानी रघुनाथ हाथ की बिकानी, सिद्ध की कृपानी कीधौं मेरी सीता रानी है ||२५|| पुनः सुक्रीया बरनन बदन जलज सोहै रदन जलज सोहे, पदन जलज सो है मोहि मन लेत है। कोल जान रंभा सम बोल जाल रंभा सम, लोल तान रंभा सम सोमा को निकेत है । दुति चीन सारंग ज्यों कटि छीन सारंग ज्यौं, लटरी निसा रँग ज्यों करत श्रचेत है । मति बुद्धि जानकी सी गतिबुद्धि जानकी सी, सतबुद्धि जानकी सी पति सुख देते है ||२६|| नवोढ़ा बरनन बैठी हुती सखियन में सुंदर नवेली बाल गुरुजन लाज तें छिपाए सब श्रंग को । तहाँ श्रइ रसलीन देखिबे की श्रास पास पास की सखीन पाए हास के प्रसंग को । घूँघट को टारिर चितवायो पिय श्रर त्योंही डीठि को उचाय लीनो यो मन अनंग को । कुलही उतारत ज्यों पीछे ते उचक गहि बेग ही पष्टि के लपटि तकि लंग को ||२७|| विश्रब्ध नवाढ़ा बरनन ias ही श्रइ बाल नैनन निहारि लाल बैठि गई तेही काल आपको छिपाई के | २५. (१) भुजान । ( २ ) कैचौं । २७. (१) छिपाइ । ( २ ) टार । ( ३ ) और । ( ४ ) डीठ । । । ५ ) योन । २६. रदन = दाँत । सारंग = सिंह | चीन सारंग = चीनांशुक |