३१२ रसलीन तनक तनक परत निस को निसार एक पाख ही मैं पूरन बदन उत्तर दरसावई ||३०|| ' 1 तैं जो है कहत सो हौं नीके करि' जानति हौं, सकुच कहाहि तासों आपनो जो कंत है । पै हौं एक बात तोसों पूछति हौं मेरी श्राली जो ही कलू श्रान बसे मेरे चित अंत है । चदमुखी मोहैं नित बोलै रसलीन लाल, तू हूँ साखि देके कही प्यारी यह तंत" है । चंद के लाज में रहे ते जोति बाढ़त है, पूरन दरख दीन्हें पावत घटत है ॥३१॥ प्रौढा बरनन 1 चाहत सदा ही देखो तुश्र मुख चंद ही को, भरे अनुराग सौ चकोर सम श्रखिए । बिन देखे लीलत श्रगार बिरहानल के, चंद्रिका सी जोति बिधि श्रानन की चाखिए । याते मते' कहां जैौ सुजान तुम्हें जान अब, आइए जो मन कछू सोई' अब भाखिए । ऐसोई उपाय कोजै श्रावन न भानु दीजे, दिन दाबि दूबि लीजे रैन गये राखिए ||३२|| ३०. ( १ ) नीके जिह । ( २ ) निहार । ( ३ ) समुझ । ( ४ ) बिचार | ३१. ( १ ) कर । ( २ ) जानन । (३) जोगंन, कर गिनत । ( ४ ) । साख । (५) तंत्र । ३२. ( १ ) याती मति । (२) सोई । (३) दाब दूव । ३१. साखि = साक्षी । ३२. आनन = मुख । ।
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