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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४५४

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३१४ नैन सनमुखर मिलि दिवसहर दीजै सुख, कोक सम टारि रैन बिरह हमारे को । तब श्रान कीन्हे घात नैन मेरे हैं पिरात ", कैसे करि हेरों तुव मुख के उज्यारे को । बाम को जाने हम इदिरा हुतीं सो अब, चंद्रमा भई हौं' हग कँवल तिहारे को ||३५|| नायिका को सयन देखो रसलीन श्रइ कौतुक सुभेख नेकु, जाकी छबि मेरे हग माँहि अब यो फिरै । ऐसी जामिनी मैं एक भामिनि सुहावनी सो, सोवत है चाँदनी में मंदिर कै बाहिरै । दूपटा नवीन सेत डारें पग ते गरे लौं, ताकी उपमान श्राव रान में यही थिरै । मानो छीर सागर की अनुजा उजागर सी, . श्रान छीर सागर के बीच उलटी सिरै ॥ ३६ ॥ पुनः नायिका को सयन पौढ़ि' परजंक पर सोवति मयंकमुखी, बाम पांय को पसारि' दच्छन सिकोरि" के । स्यों ही रसलीन एक हाथ हिथ तरें घरे, दूजो हाथ सीस ढकि राखे मुख मोरि' के । डालो नैन छोर सिर ऊपर बिराजे जोर, श्रचर को ओर उर' रह्यो छबि छोरि के" । रसलीन ३५. ( १ ) तिहि काल । ( २ ) संमुख । ( ३ ) दिवस हो तो । ( ४ ) टार । (५) परीत। ( ६ ) कर । ( ७ ) भयेहू | ३५. कोक = चक्रवाक पक्षी | इंदिरा = लक्ष्मी । ३६, जामिनी = रात्रि । छोर सागर की तनुजा = चोर सिंधु की कन्या, लक्ष्मी ।