३१६ रसलीन परकीया को मान जाहि के सनेह नौके नेह तोरि नैहर को, हेत सब लखिन को प्रानन तें छोलिए । आहि के सनेह ग्यान गुन को न ध्यान कीजे, गर्ब रूप जोबन को तिलहू न तोलिए । जाहि के सनेह लाज छांड़ि कुल लोकन की, छांह की सी रीति नित सग लागी डोलिए । श्राली तजि मोहि मन और कोई नारि' मोहि, ऐसो निरमोही" सों कबहुँ नहि बोलिए ॥४०॥ परकीया लरनन स्यामल सारी सजी उत' राधिका ठाठी भई निज पौरि सुहाए। कान्हउ तौ इत द्वार मैं श्राह खड़े भए पामरी पीत रँगाए । चातुरता रसलीन कहा कहि आपने भेद न काहू जनाए । जो रँग बोर रहे घट सों चित के पट दोऊ दुहन दिखाए ॥४१॥ 3 पुनः परकीया बरनन सहेट धाम, सारी रैन स्याम बाम बसे हैं बीति गयो ? चारो जाम भयो परभात है । बिदा है चले मुरारि योंहि ओट के किवारि, ठाढ़ी भई सुकुमारि देखन के घात है । चाहट तिया को पाइ रसलीन ललचाई, ता छन को भाय मो पै बरनो न जात है । ४०. ( १ ) तोर । ( २ ) छाड़ । ( ३ ) तज । ( ४ ) नार । ( ५ ) निर्मोही । ( ६ ) न । ४१. ( १ ) श्रुति । ( २ ) कान्हौ । ( ३ ) पूर । . ४०. नैहर = मातृगृह, पीहर । ४१. पौरि = द्वार, ड्योढ़ी । पामरी = उपर्णा, ऊर्ध्व वस्त्र । ।
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