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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४६

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( २६ ) 'शृगार तिलक' ' में भोजराज और 'रसतरंगिणी' में भानुमिश्र, जो नायिकाभेद के विशिष्ट संस्कृत आचार्य हैं, वात्स्यायन के कामसूत्र से स्पष्ट प्रभावित हैं । वात्स्यायन का कामसूत्र नायिकाभेद के प्रसंग मे दूती प्रकरण के लिये काव्यशास्त्र के श्राचार्यों का पथप्रदर्शक रहा है । वात्स्यायन के कामशास्त्र के श्रतिरिक्त कक्कोक विरचित रतिरहस्य, रसिककृत अनंगरंग, पंचशायक तथा हरिहर की शृंगारदीपिका ने काव्यशास्त्र पर अपनी छाप लगाई है । इन ग्रंथों में 'रतिरहस्य' का प्रभाव कामसूत्र के उपरांत सर्वाधिक प्रगाढ़ रहा है । इस प्रकृति एव वासना के श्राधार ग्रंथ मे पूर्ववर्ती श्राचार्य नंदिकेश्वर द्वारा रूप, पर वर्गीकृत पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी और हस्तिनी, चार प्रकार की नायिकाओं का वर्गीकरण उपस्थित किया गया है।' कामशास्त्र के इस वर्गीकरण को काव्यशास्त्र में श्रादरपूर्वक ग्रहण किया गया। हिंदी और संस्कृत दोनों के साहित्यशास्त्रों में यह वर्गीकरण है, भले ही व्यापक रूप से इसने स्थान न बनाया हो । साहित्य एवं कामशास्त्र में सुरक्षित तथा लोकजीवन मे प्रतिष्ठित शृंगार के स्थायी भाव रति के रहस्य की यह परंपरा समय समय पर साहित्य में फूली फली और श्रीमय हुई तथा भावी साहित्य के लिये इसने प्रेरणास्रोत के रूप में योगदान दिया । साहित्य में शृंगार रसराज के रूप में प्रतिष्ठित है । काम सनातन सबंध प्रत्येक युग के साहित्य में काल और देश की सीमा लाँघकर सुरक्षित है । इसलिये परंपरा से प्राप्त शृंगार की गरिमा का परिज्ञान, जो रीतिकालीन हिंदी साहित्य का मूलाधार था, यहीं कर लेना श्रावश्यक है । और रसराज का यह भारतीय साहित्य मे रस की महत्ता अनादिकाल से चली आ रही है । यह भरत के नाट्यशास्त्र से भी अधिक प्राचीन है । भरत ने अपने नाट्यशास्त्र मे 'णि' को इसका श्राविष्कारक माना है । शब्द भी हिंदी शब्दसागर में रस की व्याख्या इस प्रकार की गई है— " रसनेंद्रिय का संवेदन या ज्ञान साहित्य में वह श्रानंदात्मक चित्तवृत्ति या अनुभव बो विभाव, अनुभाव और सचारी से युक्त किसी स्थायी भाव के व्यजित होने से उत्पन्न होता है । १. रसमंजरी, पृष्ठ १ | २. एते ष्टौ रसाः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना । - नाट्यशास्त्र | .