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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४६१

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फुटकल कवित्त ३२१ पुनः प्रोषितपतिका जब तें सिधारे परदेस रसलीन प्यारे तब तें तनिक लेस सुख को न लहिए | बिरह कसाई दुखदाई भयो श्रावै नित, मेरो प्रान लेन यह कासों बिथा कहिए । पते पर पंचबान बान में गहे कमान मारै तक तक बान कैसे के निबहिए । पथिक निहारे कहौ नवल किसोर जू सों तुम बिन जोर कौन कौन को न सहिए ' ॥५३॥ श्रागतपतिका ३ श्रागमही' सुनि' मनभावन को धन मन चायन चोप चढ़े । जिय के हुलास के प्रगटत खन खन ( श्रातन ) श्रोप बढ़ र | चुरियाँ करकत नैनहुँ तरकत अँगिश्रन' जोबन रहत मढ़े । कंचन सी काया लसत ऐसी ललत मनो बिरह ते ताप कढ़े ॥५४॥ नायक को बिरह जैसे तेरो गात नए पातिन रह्यो है रात, तैसै मेरे गात पेम रात रंगर पायो है । जैसे तू पियन संमुख बैठत है' श्र श्र तैसे मौको मदन ही संमुखन छायो है । जैसे तोहि गरे पर प्रफुल्लित पदतिय' घात, तैसै मोहि प्यारी पद मोद श्रति लायो है । ५३. (१) लहे । (२) कहे । (३) निब्न्ही । (४) कौन सहै । ५४. (१) भिगामहो । (२) जिह के हुलास के प्रगटन खन क श्रोष बढ़ । (३) अंग 1 ( ४ ) ताइ । ५३. पथिक = परदेश जाने वाला । २१