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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४७४

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३३४ रसलीन जर कसे जोर तोरे कचन घोरे देत जाके जोन जटित नगन । मुहम्मद मुहसिन नंद बख्त बलंद बनाँ नूरुल हसन जोड जोलै दुहू गगन ||८०|| दुलहिन सिगार बरनन - रागिनी रामकली के भैरों सुघर बने के काज श्राश्रो बनी को बनावें, श्राछे सगुन सौ सब नारी मिलि' श्रानंद मंगल गावें । तेल फुलेल मेल उबटन में सकल अंग उबटावें; २ लाइ गुलाब नीर चंदन की चौकी पर अन्हवा । कोमल करन चरन में रचि पचि १ मेंहदी सुरंग रचावै, अगराग अँग लाइ लाइके रंग जोत उपजावैं । चदन डारि सँवारि " सुगधित बारन तेल लगावें, सतरंग पटियों काय सात लौ चोटी चार कहावें । मिसी लगाइ खवाइ पान मुख दसनन रँग जमावें, ७ ६ कजरारे नैनन काजर है सोभा को अधिकावैं । गाइ बजार बसन व्याहो सब दुलही को पहिरार्वे, ज़टी जराइ अनूप भखनन ठौर ठौर छवि छा । फूलन कुरसी डारि गरे मैं सेहरा सीस बँध वें, ८ फँहि विधि सकल सिँगार साजि' के ऊपर सारि" उढ़ावें । तब सुभ घरी बिचारि बनी को बनरे श्रानि मिलावै, लखि रसलीन जो बनरा रीभै तब मन में सुख पावै समधिन बरनन - ललित १ 115511 लाज भरी समधिन सुनि के प्रति समधी के मन भाए, रहस खेल रस रेल करन को सुभ दिन न्योत बुलाए । (१) मिल । (२) चरनन । ( ३ ) रच बच । (४) डार । (५) सँवार । (६) काली । (७) खाइ । (८) डार | ( है ) साज । (१०) सार । ८७. बखत बलद = भाग्यशाली | I ८. बने = दूल्हे । बनी = दूल्हन | सुरंग = लाल | बनरा = दूल्हा |