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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४७५

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U फुद कल कबित्त समधिन हाथी को नहि समधिन चाहै बाँस समधिन तोन लगाये ३३५ चाहै ना रथ चहै श्रमोला, चढन को लाये रँगीले डोला । आगें तोन कँहरवा पाछें, लगाये श्रागे तब काँधे काँधे धरि पाँव धरि पाँव उठावै डोला को ले श्रर्छ । समधिन के आगे डारत है रँग छाती खोलि ४ देत तब हाथन अति गाय नचैया, भर भर मुहर रुपैया । समधिन मुख मीठो पाये ते समधी बतियन लोभा, याते डारत हैं सब समधिन के मुख मीठो चोभा । समधँहि श्रान धरयो समधिन को हँस हँस बोरा ६ ५ हाथ, समधिन मेलि दियो सब अपनी लै मुख चावन साथ । जिन्ह कारन समधिन के गारी सुन सुन भयो अनंद, सो रसलीन जगत मों जोर्वे जब लौं सूरज चंद ॥८६॥ नौमासा बरनन लाडली बहू का गावौ नौमासा । नबी अली का करम हुआ है पूजी मन की श्रासा ॥६०॥ पालना बरनन ऐसो रेलला मेरो खेलत सुहावै । पैयन तें दुख दलिद्दर ठेलि' सुख संपति गरे सौं' पिलावै ॥ ६१ ॥ पुनः पालना बरनन यह लछमन घर' श्राये । रहस रहस सब मिलि गावौ श्रानंद बढ़ाये ॥६२॥ ८६. (१) सुन । (२) नहीं । (३ चाहै । (४) खोल । (५) मैरा । (६) मैल । ६१. (१) ठेल । (२) कर ही सों । २ (१) घर मे । (२) मिल । (३) बधाए । 1 ८. रहस = एकांत । श्रमोला = अमूल्य । गाय नचैया = गाकर नाचने वाले । छाती खोलि = दिल खोलकर । चोभा = सुगंधित द्रव्य । ६०. करम = कृपा |