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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४८

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( २८ ) सिरे कहत सब रीतिकाल का व्यापक साहित्य शृंगार में अंतर्भुक्त है । जहाँ श्राचार्य भरत ने इसे 'यत्किञ्चिल्लोके शुचिमेभ्यमुज्ज्वलं दर्शनीयं वा तच्छङ्गारेणोपमीयते' माना है वहीं पद्माकर का कथन है कि 'नवरस में शृंगार रस कोइ ।" अग्निपुराण में इसकी उत्पत्ति परब्रह्मजन्य श्रहंकार से उद्भूत ममता के रूपांतर से बताई गई है और इसे आदि रस भी घोषित किया गया है । संस्कृत साहित्य में शृंगार के भीतर ही नवों रसों की स्थिति मानो गई है। शृंगार शब्द शृंग तथा श्रार दो शब्दों के अर्थ कामवृद्धि की उपलब्धि है। काम की प्राप्ति का मूल धर्म है । शृंगार इसे धारण करता है । योग से बना है, जिसका जीवन के चेतन पर्व यौवन इस शृंगार का स्थायी भाव रति है, जो सृष्टि के प्रवर्धन का मूल आधार भी है। नरनारी सृष्टि की विधायिका रति श्रनंग की वामा है। सृष्टिवृद्धि का यह श्रादि, सनातन और एकमात्र मूल कारण है। ऐसी महिमामयी को भारतीय लोकजीवन में देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है और गृहस्थ के परमधर्म कुलवृद्धि के श्रधिष्ठाता काम का संबंध जीवन के होता है। यह वृत्ति सभी और प्रत्येक देश के साहित्य में देव के रूप मे काम भी वंदनीय और पूज्य है । उस प्रदेश से है जहाँ मानव को यौवन का बोध देश और काल में मनुष्य की संगिनी रही है किसी न किसी रूप में विद्यमान रह अपनी सार्वभौम सत्ता का 'केत देती चलती है। जीवन मानस की भूमि पर संवलित साहित्य की मूल चेतना की अनुभूति में भी इस सत्ता की सस्थिति उसकी सनातन शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है। रीतिकाल के पूर्वरचित भारतीय साहित्य में भी इसको महिमा अपनी ओजस्विता के साथ प्रतिष्ठित है- संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश के साहित्य में शृंगार रस विलसिन मुक्तक अक्षुण्ण एवं श्रप्रतिस्पर्धी गौरव के साथ संस्थित हैं । १. पद्माकर प्रथावली । २. श्रृंगार वीर करुणाद्भुत हास्य रौद् वीभत्स वत्सल भयानक शांत नाम्नः । श्राम्नासिषुर्दश रसान् सुधियो वयंतु, श्रगारमेव रसनाद्रसमामनाम ॥ - भोजराज (शृंगार प्रकाश )