सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४८०

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

३४२ रसलीन मध्या उन्नतकामा लाज हिप बैठे लिए संग छरो कर माँह । लेन देत नहि नैन भर प्रीतम मुंख के छाँह ॥ ७ ॥ मध्या प्रगल्भवचना रैन बढ़े अब माँह ते तुम जानत मन बसर लाज इन देख निसि तजत संग नहिं मदनमदमाती प्रौढ़ा माँह । छाँह ॥ ८ ॥ घात । जात ॥ ६ ॥ बचन लजीले मुख करत किते रत्रीले निरख कसीले बदन को छईमुई है ताके नयनन में रमन लखत अरज के जा धन के मन हितनु तनु मह मह महके बात ॥ १० ॥ धीराखडिता विवेक प्रसंग वर्णन घात । भेद । खेद ॥ ११ ॥ स्याय । जो धीरादिक खडिता में नहिं मानत तिनके इनके मेद मैं परत नहीं कछु जिन बिबेक में श्रापनों चित दीन्हों है तिन राखो इन भेद सौ भिन्न भिन्न ठहराय ॥ १२ ॥ व्यंगादिक धीरादि को मूल कहत सब कोय । सुरचि चिन्ह खडितादि को मूल धरत कबि लोय ॥ १३ ॥ यातें बरनत हैं नहीं बेगि खंडिता माँहि । सुरति चिन्ह धीरादि में कबिजन मानत नाहि ॥ - प्रीतम = प्रियतम, नायक | १४ ॥ 11 ८ - रैन = रात्रि | माह = महीना, माघ मास । बसर = गुजारा। निसि रात । छाँह = परछाई, छाया । ६ - कसीले = कसकपूर्ण । घात = चोट । छुईमुई = लजाधुर, राजवंती । १० - अरज = निवेदन | मह मह = सराबोर होकर । बात = वायु । ११- परत = पड़ता है । खेद = शका | १४ - सुगमता = सरलता । ज्ञानत = रखते हैं, उपस्थित करते हैं ।