३४८ रसलीन यह अनुभाव श्ररु हाव में, दूजो भेद श्रवदोत । वे / दिए स्वभाविक होत नहि, ये स्वभाषिक होत ||६२|| अंग अंग पर श्रमरन, पहरे ललित सो होय । बिनु अभरन के ठोरई, छबि बिच्छत में होय ॥ ६३ ॥ भ्र ू वसन चितवन हँसन, अरु बोलन मृदु बानि । यह तेरी गति कौन की, हरत नहीं मन श्रनि ॥ ६४ ॥ जदपि चली है भरन, सबे तदपि अधिक मनहरन है, तिय इन सिँगार बिनु तन सर्जे, प्रीतम 1 साज तू आज । नूपर को बाज || ६५|| को अपनाय । सौतन के भूखन सखल, दूखन खरे बनाय || ६६ ॥ । एक एक ते सरिल सज, पेन सकल सिंगार । तोऊ गई हिय हार के लखि तुव हरि को हार ॥ ६७ ॥ बात होय सो दूर तें दीजे मोहि सुनाय । कारे हाथन जनि गहो, लाल चूनरी श्राय || ६ || प्रान ॥ ६६ ॥ लखि निसंक पिय नैन भरि, घरी सखिन की श्रान । पीपर भांवर तन भरे, पिय पर भांवर मिलन हमारो जो सदा, चाहत हो मन तो इन कुंजन में सदा, जनि पकरो मम माँह । बाँह ॥ ७० ॥ अरथ मोटई को प्रकट, यामें होत लखाय । ता मैं मन में श्रानि यह, मोटायत ठहराय ॥ ७१ ॥ स्याम को साथ तिया लखि, निज छाँह भरमाय । डरी की रोई छकी, हँसी आप को पाय ||७२ || ६३. श्राभरन = भूषण । ललित=सुंदर । ६६. भूखन = भूषण, गहना । सखल = सफल, सब । दूषन = दोष । ६७. ऐन = ठीक ठीक; भवन । हार = हारना; कठ का गहना । ७१. मोटई = मोट्टायित नामक हाव । ७२. झकी = झकने लगी, बड़बड़ाने लगी, रुष्ट हो गई। छकी = नशे में हो गई ।
पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/४८६
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