स्फुट दोहे पिय की चाह सखिन कहीं, फूल सुदरसन पाय । ऊतर दोनो नागरी, छाती पुहप दोऊ बिधि इन मैन को, सुख को नहीं बिछुरे तरफत हैं सबै, भेंटत ३४६ लगाय ॥ ७३ ॥ प्रसग । होत 90 रति बढि भए सिगार सब, हाव होत हैं ज्ञान । पुनि ताही के अति बढ़े ललन बसन किए तोर के, बिन सिगार तुष मधुरता, ॥७४॥ हेला मन में जान । ७५ ॥ सौतन के अभिमान | भई सिगार समान ॥ ७६ ॥ हौ अहीर सिसुपाल नृप, ताहि तज्यो कत तीय । घर अचेत रुकमन परी, सुनत गयो उड़ि जीय ॥७७॥ बिसनादिक तजि देवता, कहा बरचो. मोहि श्राय । सिव बोलत यह भूमि पै, गिरी सिवा मुरझाय ॥ ७८ ॥ श्रथ मन बिभचारी बरनन । बरनत बेद भाव । प्रेम रु भय विरहादि तें, मुँह सों कहे न तन बेदन तें रोग कहि, सुभाष ॥ ७६ ॥ मान ग्यान कुल कानि सब, सीस नहीं क्यों जाय । सखी स्यामघन की सुरत, मो हिय तें जनि जाय ॥ ८॥ तिय लखि पिय चख तुष परी, अचल भई अभिराम | मनु मितरहुँ बैठे भँवर, कमलन को कर धाम ॥ ८१ ॥ पुनि बियोग के भेद ये, द्वौ बिधि किए प्रकास । प्रथम पूर्वानुराग श्ररु, द्वितिय जान परिहास ||८|| बहुरि कहत रसलीन है, बिधि पूरबानुराग । एक सुने दूजे लखे, गहे प्रेम के लाग ॥ ८३ ॥ ७७. घर = धरती । रुकमन = रुक्मिणी | ७८. बिसनादिक = विष्णु श्रादि । सिवा = पार्वती, उमा । ७६. बेदन = वेदना, व्यथा । ८१. घाम = स्थान; घर । ८३. पूरबानुराग = पूर्वराग नामक वियोग शृंगार ।
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