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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/५५२

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१३. विडाल दोहा व्यथा : ( ४२१ ) इसमें ४२ व एकल, शेष तीन व द्विकल होते हैं । खिनि कुच मसकति खिनि लजति, खिनि मुख लखति बि' सेखि । छकित भयो ? पिय तिय हँसति, उच्चकति ससकति देखि ॥ - र० प्र०, ७३४ १४. मंडूक दोहा चारह एकल तथा अट्ठारह द्विकल या गुरु वर्णों से मंडूक द्वोहा बन जाता है । यथा : । "लाए पायल है' भली" परी रहेगी' 'पाइ । १० लाल ११ दीजिए १२ १ ३ माल जो १४ १५ राखौं १६ हिय सों १७ १८ लाइ || - र० प्र०, ३११ १५. श्येन दोहा -- श्येन नामक दोहे में उन्नीस द्विकल वर्ण होते हैं और केवल दस व एकल होते हैं। यथा : बडो' श्रनो खोर छो हरो" देखौ " री यह श्रनि । १ मे १२ १२ नीबी १४५ पाँति जिन तोरी" में "दा जा" नि || - र० प्र०, २१५७ सबैया 1 रसलीन के फुटबल काव्य मे कुछ सवैये भी मिलते हैं । ये दो प्रकार के हैं १. मत्तगयंद सवंया जिसमे सात भगण ( Sll ) और अंत मे दो गुरु होते हैं, उसे मत्तगयंद सवैया कहते हैं । यथा : 1 कान्ह चले बन को तब बाल को सास ने काज कह्यो घर ही के बेग ही बेग तिन्हें करि कै जब जान लगी मिस कै ढिग पी के 1