( ३६ ) साधन भी न था । इसलिये संप्रदाय के उपदेष्टाओं और प्रवर्तकों के लिये भी उस युग मे काव्यशास्त्र का ज्ञान श्रावश्यक था । श्रतएव इस युग मे काव्य एव धर्म का योग हुआ तथा प्रबुद्ध लोगों द्वारा काव्य को परम प्रतिष्ठित पद दिया गया । श्रन्य कलाऍ काव्य के पूरक रूप मे स्वीकार की गई । इसलिये संगीत और काव्य दोनो ने राधाकृष्णा के इस रूप का विस्तार और प्रसार किया। इस प्रकार साहित्य और धर्म दोनो की परंपरा से रीतिकालीन साहित्य लाभान्वित हुआ । रीतिकालीन काव्य मे रस के प्रसंग में नायक-नायिका भेद का व्यापक विस्तार है । यह विस्तार रसराज शृंगार के श्रालंबन विभाव के रूप में राधाकृष्ण के माध्यम से फूला, फला और पल्लवित हुआ । रीतिकाल के साहित्य में मौलिक चितन का प्रभाव है, किंतु उसके मूल तत्वों का उत्स संस्कृत साहित्य के शास्त्रग्रंथों में है । इसलिये नायिकाभेद की परंपरा का ज्ञान भी प्राप्त कर लेना अप्रासंगिक न होगा | संस्कृत साहित्य के शास्त्र ग्रंथों मे श्राचार्य भरत के नाट्यशास्त्र के २४, २५ र २४ वे अध्याय में नायक-नायिका-भेद से सबद्ध सामग्री है | L यद्यपि दृश्यकाव्य के समग्र पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डालनेवाले इस प्रथमे अभिनेयता के परिनिवेश मे नायक नायिका के विषय में संक्षिप्त वर्णन एवं विवेचन है, तो भी कामशास्त्र की दृष्टि से इस विषय की चर्चा का सर्वथा श्रभाव उसमें नहीं है। अभिनय की दृष्टि से काम के श्रौचित्य की मर्यादा का संयोजन भी उसमे किया गया है। इस ग्रंथ मे भरत मुनि ने -- जातीय शील, सामाजिक याचार व्यवहार, नायक के साथ नायिका के संयोग एवं वियोग की अवस्था, नायक के प्रति अनुराग के अनुसार नायिका के गुण, नायिका की प्रकृति, वयक्रम से विकासशील कामशीला एवं श्रतः पुर में रहनेवाली नारियों के आधार पर कुल आठ प्रकार से नायिका का भेद किया है । इन्हे यहाँ देखना अप्रासंगिक न होगा । [ क] जातिगत शील के अनुसार- देवताशीला, श्रसुरशीला, गंधर्वशीला, नागशीला, पत्नीशीला, पिशाचशीला, यक्षशीला, व्यालशीला, नरशीला, वानरशीला, इस्तिशीला, मृगशीला, मीनशीला, उष्ट्रशीला, मकरशीला,
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