( ३७ ) जनशीला, सूकरशीला, बाजीशीला, महिषाशीला, श्रजाशीला एवं गोशीला, ये २१ भेद लौकिक एवं अलौकिक जातियों के शील के आधार पर हैं' । [ख] सामाजिक श्राचार व्यवहार के अनुसार -- बाह्या ( कुलीना ), श्राभ्यंतरा ( सामान्या या वेश्या ), बाह्याभ्यतरा ( कृतशौचः - वृत्ति छोड़कर पवित्रतापूर्वक अपने नायक के साथ रहनेवाला वेश्या ), जिसके कुनना और कन्यका दो और प्रभेद हैं। इस प्रकार इसके तीन भेद हुए और दो प्रभेद | पाँच प्रकार को नायिकाएँ सामाजिक ग्राचार व्यवहार के आधार पर इस वर्ग में बनाई गई है | कुल 1 [ग] प्रेम की अवस्था ( नंयोग एवं वियोग ) के अनुसार - वासकसज्जा, विरहोत्कठिता, स्वाधीनपतिका, कनान रेत, खंडिना, पिलब्धिका प्रोषितपतिका तथा अभिसारिका, ये आठ भेद संयोग और वियोग के आधार पर नायिका की अवस्था के अनुसार किए गए हैं। 3 [घ] नायक के प्रति अनुराग के अनुसार - मदनातुरा, अनुरक्ता तथा विरक्ता, ये तीन भेद नायिका में नायक के प्रति उत्पन्न कामानुराग के आधार पर किए गए हैं । [ङ ] प्रकृति के अनुमार - उत्तमा, मध्यमा तथा अधमा ये नारी के तीन भेद उसकी प्रकृति के अनुसार किए गए हैं" 1 [च] गुण के अनुसार - दिव्या, नृपत्नी, कुनस्त्री और गणिका, ये चार भेद नायिका के गुण धर्म के अनुमार किए गए हैं । [ छ ] यौवन वय विकास क्रम के अनुसार- प्रथम यौवना, द्वितीय यौवना, तृतीय यौवना, चतुर्थ यौवना—ये चार भेद यौवन के वय विकास क्रम के अनुसार किए गए हैं । १ नाट्यशास्त्र - २४/२६२, ३६३, २३४, २१५ । २. नाट्यशास्त्र - २४/१४२, १४३, १४४, १४५ । ३. नाट्यशास्त्र - २४/२०३, २०४ । ४. नाट्यशास्त्र - २५/१९, २०, २१, २२ । ५. नाट्यशास्त्र -- २५।२३, २४, २५ । ६. नाट्यशास्त्र -२४/७ । ७. नाट्यशास्त्र - २५/२६, २७ ।
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