सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/५८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

( ३८ ) [ज] अन्तःपुर की रमणियों के अनुसार महादेवी, देवी, स्वामिनी, स्थापिता, भोगिनी, शिल्पकारिणी, नाटकीया, नर्तिका, अनुचारिका, संचारिका, परिचारिका, प्रेोषणचारिका, महत्तरी, प्रतिहारी, कुमारी, स्थविरा तथा श्रायुक्तिका, ये १७ भेद उन रमणियों के हैं जो राजप्रासाद में रहती थीं ' । विविध श्राधारों पर किये गये थे भेद इस तथ्य के प्रतीक हैं कि नाटक मे साहित्यिक रसवत्ता एवं अभिनय की रसात्मक दृश्यवत्ता की दृष्टि से साहित्य में प्रयुक्त सभी प्रकार की नायिकाओं का बाह्य तथा श्राभ्यतर दोनों रूपों से नाट्यशास्त्र मे वर्णन किया गया है। श्राचार्य भरत के बाद श्राचार्य रुद्रभट्ट ने ( नवीं शती) नायिकाभेद, 'शृंगारतिलक' मे निम्नलिखित रूप मे उपस्थित किया है :- नायिकाभेद - स्वकीया, परकीया और सामान्या । स्वकीया के प्रभेद - मुग्धा, मध्या तथा प्रगल्भा । मुग्धा के प्रभेद-- नवयौवना, नव नगरहस्या तथा लज्जाप्रायरति । मध्या के प्रभेद - धीरा, श्रधीरा, धीराधीरा । प्रगल्भा के प्रभेद -- धीरा, श्रधीरा, धीराधीरा । 4 श्रवस्था के अनुसार नायिकाएँ - स्वाधीनपतिका, उत्का, वासकसज्जा, श्रभिसंधिता, विप्रलब्धा, खडिता, श्रभिसारिका एवं प्रोषितपतिका । इन्होंने इन सबके तीन तीन प्रभेद - उत्तमा, मध्यमा और श्रम के नाम से किए हैं। ३ इसी शताब्दी में रुद्रट ने 'काव्यालकार' मे भी लगभग उपरोक्त प्रकार से ही नायिकाभेद का निरूपण किया है । नायिका के तीन भेद - श्रात्मीया, परकीया, वेश्या । १. नाट्यशास्त्र - ३४।२६, ३०, ३१ । २. रसमंजरी, पृ० ३। ३. संस्कृत साहित्य का इतिहास, पोद्दार, पृष्ठ ११५ । अनेक विद्वान यह भी मानते हैं कि रुद्रट रुद्रभट्ट के पूर्ववर्ती हैं और उनसे रुद्रभट्ट प्रभावित भी हैं । कुछ यह भी मानते हैं कि दोनों एक ही हैं । ( दे०, संस्कृत श्रालोचना का इतिहास और काव्यप्रकाश ( ज्ञानमंडल ) की भूमिका । )