( २ ) केवल इतना ही रचयिता २" श्रौर दर्पण का दूसरा नाम शिखनख ही रखा है ।" हिंदी साहित्य के प्रथम इतिहास में ग्रियर्सन महोदय ने नत्री कवि के संबंध में लिखा है "शृंगार संग्रह में भी एक सुंदर नखशिख के रसलीन गुलाम नबी के प्रसंग में उनके दो ग्रंथ श्रंगदर्पण रसप्रबोध (१७४१ ई०) क्रमशः नखशिख और काव्यशास्त्र के ग्रंथ के रूप में लिखने की बात कही है। सन् लिखने की भूल हो गई है, वास्तव में १६३७ के स्थान पर १७३७ चाहिए । में (१६३७) श्रीर दिग्विजय भूषण में शिवसिह के श्राधार पर नबी कवि के केवल एक प्र'थ नखशिख का उल्लेख है । रसलीन के संदर्भ में उनके नखशिख- संबंधी दोहों का उल्लेख है । वास्तव मे ये दोनो कवि एक हैं और इन प्राचीन ग्रंथों में ग्रियर्सन ने इनके बिन दो ग्रंथों की चर्चा की वे ही इनके दो ग्रंथ हिंदी जगत् में सबने एक स्वर से स्वीकार किए। यदि दोनों नामों को एक माना गया होता तो इनमें स्फुट कबित्त भी बहुत पहले प्रकाश में श्री गए होते। इसका कारण यह भी है कि हिंदीवाले यह नहीं मानते थे कि फारसी में भी हिदी साहित्य का अतुल भंडार भरा पड़ा है और जो की कृपा से हिंदी और फारसी का भेद इतना बढ़ा दिया गया कि अतीत में भी लोग हिदुओं को हिदी में तथा मुसलमानों को उर्दू और फारसी में देखने लगे जब कि सत्य यह है कि देवनागरी में भी उर्दू-फारसी का साहित्य लिखा गया और फारसी लिपि में भी हिंदी का साहित्य, हिंदू श्रौर मुसलमान दोनों द्वारा । यदि इस तथ्य की उपेक्षा न की गई होती और अंग्रेजों की दृष्टि को अपनी दृष्टि न मान लिया गया होता तो हिंदी और फारसी- उर्दू सबका भला होता । इस क्षेत्र में काम करनेवालों में मीर गुलाम श्री आजाद बिलग्रामी का नाम अत्यंत आदर्श है, जिन्होंने अपने ग्रंथ सर्वे- श्राजाद में जो 'मतबा दुखानी रिफाहे श्राम लाहौर दारुस्सलतनत पंजाब' से १. पृष्ठ २८७ २. हिदी साहित्य का प्रथम इतिहास, डा० किशोरीलाल गुप्त सं० ) पृ० ३१६ ३. वही, पृष्ठ ३०४ ४. दिग्विजय भूषण, पृष्ठ ५०
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