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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/६१

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( ४१ ) 1 ये सभी नायिकाएँ मुग्धा को छोड़कर तीन प्रकार की होती हैं । ये श्रन्यसंभोगदुःखिता, वक्रोक्तिगर्विता श्रौर मानवती में वर्गीकृत की जाती हैं । गर्विता, प्रेमगर्विता और सौदर्यगर्विता । मानवती - लघुमानवती, मध्यमानवती और गुरुमानवती होती हैं । इस प्रकार स्वीया १३, परकीया २, सामान्या १, तीनों मिलकर १६ प्रकार की नायिकाएँ भानुदत्त ने रचीं । अवस्थाभेद के कारण प्रत्येक के आठ प्रकार होते हैं: -- प्रोषितपतिका, खंडिता, कलहात रिता, विप्रलब्धा, उत्का, वासकसज्जा, स्वाधीनपतिका तथा श्रभिसारिका । इस प्रकार ये सब ( १६x८ ) १२८ प्रकार की हुईं। ये उत्तमा मध्यमा एवं अधमा भेद के अनुसार ( १२८३ ) = ३८२ प्रकार की हुई । दिव्या, दिव्या और दिव्या दिव्या भेदों के अनुसार ये ( ३८४ x ३ ) = ११५० भेदों में विभाजित होती है। प्रत्स्य- स्पति की चर्चा भी इन्होंने की है ।" रूप गोस्वामी ने अपने ग्रंथ 'उज्ज्वल नीलमणि' मे स्वकोया की अपेक्षा परकीया को अधिक महत्व दिया है। चैतन्य द्वारा प्रवर्द्धित गौड़ीय वैष्णवों मे गोपियों की कृष्ण के प्रति की गई टूट श्रद्धा तथा निष्ठापूर्वक रतिभाव की उपासना नैसर्गिक और श्रादर्श मानी गई । इसलिये मधुर रस की सृष्टि उन्होंने की और श्रीकृष्णविषयक रति को उन्होंने मधुर रस का स्थायी भाव माना तथा परकीया को स्वकीया से श्रेष्ठ ठहरायाः । . इस प्रकार रीतिकालीन नायिकाभेद के साहित्य को परंपरा का सबल श्राधार प्राप्त था । इस रीतिकाल के ऐसे कवियों को जिन्होंने रसचर्चा के प्रसंग मे विस्तारपूर्वक नायिका भेद का लक्षण एव उदाहरण प्रस्तुत किया है, उन्हें शास्त्र कवियों के रसनिरूपक परंपरा के उपभेद के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है। रस के विशद एवं गंभीर विवेचक की दृष्टि से इनका महत्व नहीं किंतु रस के एक उपांग को प्रस्तुत करने की दृष्टि से इनका महत्व है । रस के सभी अंगों की तथा साहित्यशास्त्र के अन्य तत्वों एवं सिद्धांतों के गुण धर्मं का १. रसमंजरी, पृष्ठ, ५-८ । नागरीप्रचारिणी सभा पत्रिका, अंक, २, ३, वर्ष ६४, संस्कृत में नायिकाभेद तथा रसिकजीवनम् पं० करुणा- पति त्रिपाठी । ४, २. दि पोस्ट चैतन्य सहजिया कल्ट धाव बंगाल - डॉ० मनींद्रमोहन . बोस, सन् १९३०, पृ० १६-६७ ।