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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/७९

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७. अप्राप्य ८. श्रप्राप्य ( कवित्त और दोहे) ६. बिहारी सतसई, ( ५६ ) फारसी + हिंदी ब्रजभाषा अरबी + फारसी + ब्रजभाषा फारसी + अरबी + हिंदी रसिक प्रिया की टीका स्फुट (सभी श्रप्राप्य ) १०. तिल शतक भक्ति अरबी + फारसी अलक शतक शृंगार संस्कृत, हिंदी स्फुट कवित्त सवैया ११. नाद चंद्रिका शृगार फारसी, संस्कृत, हिंदी मधनायक शृंगार स्फुट छंद १२. पूर्णरस शृंगार संगीत शास्त्र हिंदी काव्य शास्त्र ( श्रप्राप्त ) नख सिख अरबी + फारसी १३. शिख नख शिख नख तुर्की, अरबी, फारसी पेम कथा चौपाई ( बरवै छंद ) हिंदी संस्कृत कसीद ए गर्दाई ( दोहा ) ( बीच मे हिंदी छंद ] वारिफे हिंदी भक्ति अरबी, फारसी, संस्कृत हिंदी, उर्दू ज्ञान ( हिंदी संस्कृत ) १४. प्रेम प्रकाश ( प्रकाशित ) बिलग्राम मे उत्पन्न इन पूर्वकालिक तथा समसामयिक मुसलिम कवियों की काव्य धारा का भी प्रभाव रसलीन पर श्रवश्य ही पड़ा होगा श्रौर उनके काव्य का अध्ययन करने का भी अवसर उन्हे मिला होगा । यद्यपि इनके अतिरिक्त बिलग्राम के हिंदू कवियों के काव्य का भी उन्होंने अवलोकन श्रवश्य ही किया होगा जिनकी काव्य सर्जना भी उनसे विलग पंथ की अनुगामी नहीं थी । ऐसे तो बिलग्राम विद्वानों एवं कवियों तथा शायरों की खान ही था जहाँ से भाषा और साहित्य की श्री वृद्धि करने का सतत यत्न मध्य युग मे हुआ । ऐसी विमल साहित्यिक परंपरा के मध्य रसलीन ने अपनी साहित्य रचना के लिये संबल प्राप्त किया ।