( ६० ) सहज अनुभूति जत्र विशाल ज्ञान के संयोग से भाषा मे मूर्त होती है तो कालातीत साहित्य की सृष्टि होती है। ऐसे ही ज्ञानी स्रष्टा, जिनका साहित्य से अनुराग था और जिन्होने जीवन यापन के लिये तलवार का सहारा लेकर जीवन को भली भाँति देखा और भोगा था, रसलीन थे । फारसी, अरबी, संस्कृत, रेखता, ब्रज आदि भाषाओं का उन्हे गंभीर ज्ञान था और काव्य रचना से प्रेम । इसके लिये अनुभूतिग्राही जीवन भी उन्हे मिला था । उन्होंने फारसी लिपि में ठीक ठीक हिंदी लिखने के लिये एक श्रोर जहाँ फारसी लिपि मे परिष्कार किया, संस्कृत के साहित्य शास्त्र के ग्रंथों से ज्ञान अर्जित किया, अन्यत्र के हिंदी के श्रेष्ठ कवियों का अध्ययन किया, वहीं फारसी, ब्रज और रेखता मे रचनाएँ भी कीं, जिनका विस्तृत अध्ययन श्रागे किया जाएगा । चौधरी बसीयुल हसन बिलग्राम के 'रोजतुल कराम' के अनुसार रसलीन का विवाह उनके विद्वान् सगे मामा सैयद करम उल्लाह की कन्या के साथ हुआ था । उनकी वशावली उस ग्रंथ के अनुसार इस प्रकार है:- सैयद गुलाम नबी 'रसलीन' सैयद बासित अली तसल्ली बीबी शादी मुहम्मद अकबर सैयद निहाल सैयद अली रजा उजियाली बीबी जानी बीबी शादी शादी सखावत अली गुलाम सादिक रसलीन परम स्वाभिमानी व्यक्ति थे । स्वाभिमान पुरुषार्थ के बल पर दीप्ति पाता है । पुरुषार्थी का माथा सत्य और सर्जनहारे के संमुख ही नवता है। सच्चा स्वाभिमानी दया पर नहीं शक्ति पर विश्वास करता है । याचना का जीवन कर्म पर कलंक हैं। ज्ञान कर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करता है और मान को ही जीवन का सत्व समझता है । स्वाभिमानी इसके लिये बड़ा से बड़ा त्याग सहर्ष करता है और कष्ट और श्रभावमय जीवन में भी सहब ही संतोष की साँस लेता है ।
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