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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/८१

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( ६१ ) । मध्य युग में तलवार के धनी ज्ञान से विरत नहीं होते थे। रसलीन नबाब सफदरजंग की सेना मे कुशल सैनिक थे और धनुर्विद्या मे अपना सानी नहीं रखते थे। जीवन यापन के क्षेत्र में अपने कर्म के कारण वे प्रतिष्ठित थे। स्वाभिमान उनका ऐसा था कि किसी के भी सामने वे झुकने वाले नहीं थे । इसीलिये गुरु, ईश्वर, धर्म दूतों, पूर्वजों, संतों श्रादि की स्तुति एवं प्रशसा- तो उन्होंने की है पर किसी राजा महाराजा, नबाब या स्वामी की प्रशंसा से अपनी लेखनी का मुख मलीन नहीं किया। भले ही जीवन मे उनकी श्राह इस रूप मे प्रकट हुई :- तजि द्वार ईस को नवायो सीस मानुस को । पेट ही के काज सब लाज खोइ बावरे ॥ [ १०, ३०३ ] में पर साथ ही उनका स्वाभिमान मुहम्मद साहब की बदना जीभ चखै तुव नाम को अमृत औरन नाम को यह भी कहता है :- - पावत फीको । खातहि फीको ॥ खाटी मही कह क्यों मुख भावत जाको गयो पन चाह्यो न श्राज लौं काहूँ सो काज कि श्रावत लाज यहै नित जी को । तू बिनती करै औौरन पास कहाइ के श्राप गुलाम नबी को || [ पृ०, ३०१ ] बिलग्राम में हिदी मुसलमान सभी स्वतंत्रतापूर्वक अपने धर्म की उपासना करते थे। सूफियों की सी उनमे उदारता थी । यद्यपि वे अपने धर्म के पक्के अनुयायी थे तो भी दूसरों के धर्म का मान वे सचाई के साथ करते थे । सहिष्णुता सत् धर्मं के अभ्युदय का मूलाधार है । रसलीन भी एक ऐसे उदार- मना निज धर्मोपासक सहिष्णु कवि थे जिन्होंने मोहम्मद साहब, हजरत अली, इमाम हुसेन, इमाम हसन, दोहत, पीर और अतिथि के साथ ही साथ गंगा, राम, हनुमान और लक्ष्मण आदि को भी श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया है । इसे देख कर ऐसा लगने लगता है कि वे शिया थे किंतु वस्तुस्थिति यह है कि संत और कवि होने के लिये आदमी होना पहले श्रावश्यक है फिर कुछ और । अपने धर्म का सच्चा अनुयायी दूसरे धर्म को गिराता नहीं क्योंकि किसी को उठा कर जो श्रद्धाजंन नहीं कर सकता, वह किसी को गिरा कर स्वयं ऊँचा नहीं उठ सकता । रसलीन सच्चे अर्थ में मनुष्य थे और अपने धर्म के श्रद्धालु अनुयायी । इसलिये श्रन्य धर्मो के प्रति वे परम सहिष्णु थे । यह सहिष्णुता उनके व्यक्तित्व एवं साहित्य को मौलिक मान का अधिकार प्रदान करती है ।