. ( ६७ ) वह उत्सर्गमयी भी होती है। ज्ञान और भाव का सहज संयोग उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार ऋणात्मक ( निगेटिव) एवं धनात्मक ( पाजिटिव) के योग से प्रकाश की सृष्टि । यह क्षमता रसलीन में थी। उनके श्राचार्य रूप की व्याख्या श्रलग से प्रस्तुत की गई है। उनके काव्य भूमि की प्रस्तावना यहाँ दी जा रही है । यद्यपि रसलीन शृंगार के परिधि व्यापक है । एक श्रोर श्रेष्ठ कवि हैं तो भी उनके काव्य की वे अपने पैगबर, देवी देवताओं के प्रति, साधु और · कारण कृतज्ञता और श्रद्वा प्रक्ट करते हुए पूर्वजों के प्रति, गुरुश्रों के प्रति, संतो के प्रति उनके गुण धर्म के मिलते हैं तो दूसरी ओर अपने समकालीन मित्रों यहाँ तक कि उनके कुल परिवार के संबंधियों, दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाले तत्वों और वस्तुओं से भी अपना सहज स्नेह संबंध प्रकट करते हैं । जहाँ एक ओर वे रमणी के कटाक्ष के प्रशंसक है वहीं वे कर्मवीर, रणबाँकुरे, धर्मशील, नीतिज्ञ लोगों के प्रति भी उतने ही श्रास्थावान हैं। जहाँ वे गंगा की लहरों में खोकर प्रकृति के प्रागण मे जीवन और यौवन का गीत गाते मिलते हैं वहीं दूसरी ओर लोक जीवन के बरही, गारी; समधिन श्रादि इस प्रकार उनके जीवन मे युग मे व्यवहार पक्ष यथा छठ्ठी, विषयों पर भी अपनी लेखनी उठाते हैं । भोगे जाने वाले समग्र जीवन के चित्र हैं । ये चित्र मर्म से उत्पन्न हुए हैं क्योंकि इन्हें रचने में कवि ने भावात्मक दृष्टि -से वस्तुओं और तत्वों का साक्षात्कार कर उन्हें मूर्त्तित किया है। किसी विद्वान के लिए भाव प्रवण रचना और ज्ञान मूलकं रचना मे अतर की यह स्पष्ट क्षमता उसकी विधायिनी प्रतिभा के सामर्थ को प्रकट करती है । यह विधायिनी प्रतिभा 'रसलीन' में अपनी पूर्ण शक्ति के साथ है । कवि केवल संग्रही ही नहीं होता वह सपादक, चितक और द्रष्टा भी होता है । सग्रह का सौदर्य प्रग्राह्य के व्याग पर निर्भर करता है । सभी कुछ जो कवि देखता है यदि उसका यथातथ्य वर्णन करने लगे तो कोई कवि तो नहीं हो सकता भले ही पद्यकार हो जाय। 'रसलीन' कवि थे इसलिये उन्हें वही ग्राह्य था जो उनके मर्म को स्पर्श कर सके । यद्यपि कुसुम, झाड़ झवाड़ मे उत्पन्न होता है तो भी रसिक पुष्प के प्रेमी होते हैं न कि कॉटों के । सग्रह सपादन की यह सद्वृत्ति कवि को मैलिक धरातल देती है। इसका यह श्राशय नहीं है कि कवि का काँटों से रिश्ता नाता नहीं होता । समय और अवसर के अनुसार कभी-कभी कटक फूल से अधिक महत्व के हो जाते हैं और
पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/८७
दिखावट