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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/९३

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( ७३ ) पतितन वारिबे की रीति तेरी एरी गग. पाइ रसलीन इन्ह तेरेई प्रमान पैं । कालिमा कालिंदी सुरसती अरुनाई दोऊ, मेटि मेटि की है सेत आपने विधान में । त्योंही तमोगुन रजोगुन सब जगत केँ, करिके सतोगुन चढ़ावत बिमान पैं ||" ॥१ गंगा के किनारे रहनेवाले और उस पर अपना जीवन वारनेवाले ही ऐसी युक्ति दे सकते हैं जहाँ पर उनकी पौराणिक मर्यादा सुरक्षित रह सके । स्थान, स्थान पर ऐसे पौराणिक उदाहरण मिलेंगे, यहाँ तक कि रसलीन रामजन्म होने पर चौदह भुवनों मेँ श्रानन्द की कल्पना करते है। मंदोदरी, रावण, कृष्ण, कंस, कुब्जा, रुद्र, पवन सुत, ब्रह्मा आदि धार्मिक तथा पौराणिक पात्रों को उन्होंने उनके सही रूप में उपस्थित किया है । जीवन का दूसरा रूप समर का युद्धभूमि बन गया था । संक्षेप मे वर्णन किया है । था। सारा उत्तरी भारत उनके समय मे वीर रस का भी उन्होंने बड़ा श्रोजस्वी कटुता मिटाने के लिये वे अन्य पक्षों पड़ते हैं । योद्धा रूपसौंदर्य और वे स्वयं सैनिक थे इसलिये युद्ध की की श्रोर अधिक उन्मुख होते दिखाई शांति के लिये लालायित रहता है। शांति उसे निर्वेदिक जीवन मे मिलती है और आनंद रूप सौंदर्य के रमण मे । रसलीन का निर्माण अलमस्त, फक्कड़ संतों के बीच हुआ था इसलिये निर्वेद मे भी वे रमते थे। उनके निर्वेद संबंधी दोहे यद्यपि थोड़े हैं तो भी वे बड़े तत्वपूर्ण हैं । वे भोग में योग और योग मे भोग मानने वाले रसिक जीव थे : प्रभु राचे ते श्रानि के यह गति करति उदोत । भोग जोग में होत है जोग भोग में होत ॥ २ यद्यपि वे कोई संत नहीं थे तो भी उनकी एतद् सबंधी अनुभूति सूफियाना ठाठ की थी- १. पृष्ठ ३०६ । २. पृष्ठ २०६ ।