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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/९५

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( ७५ ) आज भी बने हैं। इस प्रकार श्राज के लोकाचार श्राधार देते है । जो किसी न किसी रूप में को ये लोकगीत परंपरा का उदाहरण के रूप में समधिन वर्णन में दी गई कविता' दी जा सकती है जिसमें लेन देन, हँसी ठिठोली और गारी की बात बघावे के साथ उपस्थित है। जहाँ संसार में सूरज और चाँद तक समधिन के जीवन की याचना की गई है वहीं लोक मे प्रचलित बाँस चढ़ने की बात भी रँगीले ढंग से की गई है । यद्यपि श्राज के नागर लोग ऐसे गीतों को असभ्यता का प्रतीक और अश्लील समझते हैं तो भी इसका मर्म वे ही समझ पाते हैं जो घरबार के सबधों की पवित्रता का आनंद लेने के अभ्यासी हैं । रसलीन की ख्याति मूलतः शृंगार के कवि के रूप में है । उनकी पहली रचना श्रंगदर्पण या सिखनख है । यह रसपूर्ण रचना ब्रजबानी सीखने सिखाने के उद्देश्य से रची गई है जिसमे श्रर्थ रत्न के समान जड़ित हैं । इसमें नायिका के श्रंग प्रत्यग का रूप उसी प्रकार प्रकट हुआ है जैसे दर्पण मे छवि का दर्प | यह रचना श्रीप्रभु का नाम लेकर ३८ वर्ष की श्रायु मे कवि ने पूरी की है। यह पहली रचना नायिका के अग प्रत्यंग, तथा उसके अलंकारपूर्ण श्राकर्षक रूप का चित्र प्रस्तुत करती है । यह यौवन की यौवनमयी रचना है । श्राराध्य या प्रेमिका के नखशिख वर्णन की प्रथा इस देश मे बड़ी प्राचीन है । संस्कृत के ग्रथ इससे भरे हैं और हिंदी में भी यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है । नख शिख के ऊपर सैकड़ों ग्रथ हिंदी में भी हैं। ये ग्रथ दो प्रकार के हैं, एक तो नख-शिख वर्णन धार्मिक है और उसके अतिरिक्त संस्कृत में श्रीहर्ष और कालिदास जैसे कवियो ने नखशिख वर्णन किया है । १, पृष्ठ ३३४-३५ हिंदी में खोज में उपलब्ध विवरण है - नख शिख (पद्य) अब्दुर्रहमान मिर्जाकृत नखशिख उम्मेद सिंह कृत नख शिख (पद्य) कलानिधि ( भट्ठ) कुन नख शिख (पद्य) कान्ह कृत नख शिख (पद्य) कालिका प्रसादकृत नख शिख (पथ) कुलपतिकृन