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पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/७२

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दोहे।

रहिमन कबहूँ बड़ेन के, नहीं गर्व को लेस।
भार धरे संसार को, तऊ कहावत सेस[]॥१६५॥
रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि।
दूध कलारिन हाथ लखि, मद समुझैं सब ताहि॥१६६॥
 
रहिमन अब वे बिटप कहँ, जिनकी छाँह गँभीर।
बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़[] कंज[] करीर॥१६७॥
रहिमन निज मनकी बिथा, मन ही राखौ गोय[]
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥१६८॥
 
रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगि है देर॥१६९॥
रहिमन वे नर मरि चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मरे, जिन मुख निकसत नाहिं॥१७०॥
 
रहिमन मनहिं लगाय कै, देखि लेहु किन कोइ।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होइ॥१७१॥
रहिमन लाख भली करो, अगुनी अगुन न जाइ।
राग सुनत पय पियत हूँ, साँप सहज धरि खाइ॥१७२॥
 
रहिमन दानि दरिद्र तर, तऊ जाँचिबै[] जोग।
ज्यों सरितन सूखा परे, कुवाँ खनावत लोग॥१७३॥


  1. शेषनाग,अवशिष्ट।
  2. सेहुँड़ा, एक कटीला पेड़ होता है।
  3. लता के आकार का एक कटीला वृक्ष।
  4. गोपन करके, छिपा करके।
  5. याचना, माँगना।