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पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/९४

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बरवै नायिका-भेद।

 

परकीया-कलहान्तरिता—

जेहि लगि कीन बिरोगवा, ननद जेठानि।

लीन न लाइ करेजवा, तेहि हित जानि॥५३॥

गणिका-कलहान्तरिता—

जेहि दीन्हे बहु बेरिया, मोहिं मनि-माल।

तेहते रूठेउँ सखिआ, फिरि गौ लाल॥५४॥

४–बिप्रलब्धा।


मुग्धा-बिप्रलब्धा—

मिलेउ न कन्त सहेटवा[], लखेउ डेराइ।

धनिआ[] कमल बदनिआ, गौ कुभिलाइ॥५५॥

मध्या-बिप्रलब्धा—

लखेसि न केलि-भवनवाँ, नन्द-कुमार।

लै-लै ऊँचि उससवा, ह्वइ बिकरार[]॥५६॥

प्रौढ़ा-बिप्रलब्धा—

देखि न कन्त सहेटवा, भो दुख पूरि।

रोवत नैन कजरवा, ह्वै गौ दूरि॥५७॥

परकीया-बिप्रलब्धा—

बैरिनि मह अभिसरवा, अति दुखदानि।

तापर मिल्यो न मितवा, भो पछितानि॥५८॥

गणिका-बिप्रलब्धा—

करिकै सोरह सिंगरवा, अतर लगाइ।

मिलेउ न लाल सहेटवा, फिरि पछिताइ॥५९॥

  1. एकान्त स्थान।
  2. नायिका।
  3. बेकल।