पृष्ठ:राजा और प्रजा.pdf/१०२

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कण्ठ-रोध।
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देशान्तरित न कर सकेंगे। वे क्रोध करके आघातकी मात्रा बढ़ा सकते हैं, लेकिन उसके साथ ही साथ वेदनाकी मात्रा भी बढ़ती जायगी। क्योंकि यह प्रकृतिका नियम है। पिनल कोड उसे रोक नहीं सकता। यदि मनकी जलन वाक्योंके रूपमें बाहर न निकले तो वह अन्दर ही अन्दर जमा होती रहेगी। इस प्रकारकी अस्वास्थ्यकर और अस्वाभाविक अवस्थामें राजा और प्रजाका सम्बन्ध जैसा विकृत हो जायगा उसकी कल्पना करके हम बहुत ही डर रहे हैं।

लेकिन यह अनिर्दिष्ट संशयकी अवस्था ही सबसे बढ़कर अमंगलजनक नहीं है। हम लोगोंके लिये इससे भी बढ़कर एक और अशुभ बात हैं। यह बात हम लोगोंने अँगरेजोंसे ही सीखी है कि मनुष्यके चरित्रपर पराधीनताका बहुत ही अवनतिकारक परिणाम होता है। असत्याचरण और कपटता अधीनजातिके लिये आत्मरक्षाका अस्त्र हो जाती है और उसके आत्मसम्मान तथा मनुष्यत्वको अवश्य ही नष्ट कर देती है। स्वाधीनतापूजक अँगरेज अपनी प्रजाकी अधीन दशासे उस हीनताके कलंकको यथासंभव दूर करके हम लोगोंको मनुष्यत्वकी शिक्षा देनेमें प्रवृत्त हुए थे। उन्होंने पद पदपर हमें यह स्मरण नहीं दिलाया था कि तुम लोग विजित हो और हम विजेता हैं, तुम लोग निर्बल हो और हम लोग सबल हैं। उन्होंने इस बातको मनसे यहाँतक भुला दिया था कि हम लोग सोचने लगे थे कि अपने हृदयके भावोंको प्रकट करनेकी स्वाधीनता हम लोगोंके मनुष्यत्वका स्वाभाविक अधिकार है।

आज हम सहसा जागकर देखते हैं कि दुर्बलका कोई अधिकार ही नहीं है। हम लोग जिस बातको मनुष्यमात्रके लिये प्राप्य समझते थे वह दुर्बलके प्रति प्रबलका मनमाना अनुग्रह मात्र है। आज हम इस सभास्थलमें खड़े होकर जो केवल शब्दोच्चारण कर रहे हैं सो इससे