पृष्ठ:राजा और प्रजा.pdf/१०४

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कण्ठ-रोध।
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सन्देह नहीं है कि इससे हम लोगोंका आत्मसम्मान बढ़ गया था। हम लोग जानते थे कि हम लोगोंके देशके शासनका जो बहुत बड़ा काम है उसमें हम लोग बिलकुल अकर्मण्य और निश्चेष्ट नहीं हैं, उसमें हम लोगोंका भी कुछ कर्त्तव्य है, हम लोगोंका भी कुछ दायित्व है। ऐसी दशामें जब कि इस शासन कार्य्यपर ही प्रधानतः हम लोगोंका सुख दुःख और शुभ अशुभ निर्भर करता है तब यदि उसके साथ हम लोगोंका किसी प्रकारके मन्तव्य अथवा वक्तव्य बन्धनका संबंध न रहे तो हम लोगोंकी दीनता और हीनताकी कोई सीमा नहीं रह जाती। विशेषतः हम लोगोंने अँगरेजी विद्यालयोंमें शिक्षा पाई है, अँगरेजी साहित्य पढ़नेके कारण अँगरेज़ कर्मवीरों के दृष्टान्त हम लोगोंके अन्तःकरणमें प्रतिष्ठित हुए हैं और हम लोगोंने उस परम गौरवका अनुभव किया है कि सब प्रकारके कामों में अपने कल्याणके लिये हमें स्वतंत्र अधिकार है। आज यदि हम अचानक अपने भावोंको प्रकट करनेकी उस स्वतंत्रतासे वंचित हो जायँ, राजकार्य्य चलानेके साथ हम लोगोंका समालोचनावाला जो थोड़ासा सम्बन्ध है वह एक ही आघातमें टूट जाय और हम लोग निश्चेष्ट उदासीनतामें निमग्न हो जायँ, कपट और मिथ्या बातोंके द्वारा प्रबल राजपदके नीचे अपने मनुष्यत्वका पूरा पूरा बलिदान कर दें, तो पराधीनताकी सारी हीनताओंमें उच्च-शिक्षा-प्राप्त आकांक्षाकी वाक्यहीन व्यर्थ वेदना मिल जायगी और हम लोगोंकी दुर्दशाकी पराकाष्ठा हो जायगी। जिस सम्बन्धमें आदान-प्रदानका एक छोटासा मार्ग खुला हुआ था, भय उस मार्गको रोककर खड़ा हो जायगा। राजाके प्रति प्रजाका वह भय गौरवजनक नहीं है और प्रजाके प्रति राजाका वह भय भी उतना ही अधिक शोचनीय है।