पृष्ठ:राजा और प्रजा.pdf/२०६

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समस्या।
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न ग्रहण करेंगे। उधर बाहरी लोगोंके साथ यह घोषणा करते ही इधर घरमें ही एक ऐसा झगड़ा खड़ा हो गया जैसा आजतक कभी नहीं हुआ था। हिन्दू-मुसलमानका विरोध एकाएक अत्यन्त भयंकर मूर्ति धारणा कर सामने आ गया।

हमें चाहे इस व्यापारसे कितनी ही कष्ट क्यों न पहुँचा हो, पर वह हमारी शिक्षाके लिये नितान्त आवश्यक था। हम सबको यह बात अच्छी तरह जान लेनेकी आवश्यकता थी कि हम हजार चेष्टा करके भी इस सत्यको नहीं भूल सकते कि हमारे देशमें हिन्दू और मुसलमान एक नहीं हैं, पृथक् पृथक् हैं। यह सत्य प्रत्येक कार्यमें ही हमें बलात् याद पड़ा करेगा। यह कहकर मनको धोखा देनेसे काम न चलेगा कि हिन्दू मुसलमानोंके सम्बन्धमें कभी कोई खराबी न थी, इनमें विरोध करानेके कारण केवल अंगरेज ही हैं।

यदि सचमुच यही बात है, अँगरेजोंने ही मुसलमानोंको हमारे विरुद्ध खड़ा होनेका पाठ पढ़ाया है तो उन्होंने हमारा महत् उपकार किया है। जिस प्रकाण्ड सत्यकी नितान्त उपेक्षा कर हम बड़े बड़े राष्ट्रीय कार्योंकी योजनाएँ तैयार कर रहे थे उसकी ओर आरम्भमें ही उन्होंने हमारी निगाह फिरा दी है। यदि हम इससे कुछ भी शिक्षा न ग्रहण कर उलटे शिक्षक ही पर क्रोध करना कर्तव्य समझेंगे तो हमको फिर ठोकर खानी पड़ेगी। जो सच्ची बाधा है उसका सामना हमें करना ही पड़ेगा, चाहे जैसे करें, उसकी निगाह बचाकर निकल जानेका कोई रास्ता ही नहीं है।

यहाँपर यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी होगी कि हिन्दू और मुसलमान वा हिन्दुओंहीमें उच्च और नीच वर्णोके परस्पर असंयुक्त और अलग रहनेसे हमारे कार्यमें विघ्न उपस्थित हो रहा है। इसलिये