पृष्ठ:राजा और प्रजा.pdf/८६

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सुविचारका अधिकार।
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हैं उनमें कुछ अधिक गरमीके लक्षण दिखाई देते हैं। मुसलमान लोग भी जानते हैं कि हमारे लिये विष्णुके दूत खड़े हुए आसरा देख रहे हैं और हम लोग भी मन ही मन काँपते हुए इस बातका अनुभव करते हैं कि हम लोगोंके लिये दरवाजेके पास हाथमें गदा लिए हुए यमके दूत बैठे हुए हैं और ऊपरसे उन यमदूतोंकी खोराकी हमें अपने पल्लेसे देनी पड़ेगी।

इस बातपर भी विश्वास नहीं होता कि हम लोग हवाकी गतिका जिस रूपमें अनुभव करते हैं वह बिलकुल ही निर्मूलक है। थोड़े ही दिन हुए स्टेट्समैन नामक समाचारपत्रमें गवर्नमेन्टके उच्च उपाधिधारी किसी श्रद्धेय अँगरेज सिविलियनने यह बात प्रकाशित कराई थी कि आजकल भारतमें रहनेवाले साधारण अँगरेजोंके मनमें हिन्दुओंके प्रति विद्वेषका कुछ भाव व्याप्त हो रहा है और मुसलमान जातिके प्रति उनमें एक आकस्मिक वात्सल्य रसका उद्रेक दिखाई देता है। यदि हमारे मुसलमान भाइयोंके लिये अँगरेजोंके स्तनोंमें दूध उतरता हो तो यह बात हमारे लिये आनन्दकी ही है, लेकिन हम लोगोंके लिये यदि केवल पित्तका ही संचार होता हो तो निष्कपट भावसे उस आनन्दको बनाए रखना कठिन हो जाता है।

यह बात नहीं है कि केवल राग या द्वेषके कारण ही पक्षपात अथवा अविचार हुआ करता हो, भयके कारण भी न्यायपरताके तराजूका काँटा बहुत कुछ काँपने लगता है। हम लोगोंको इस बातका सन्देह होता है कि अँगरेज लोग मुसलमानोंसे मन ही मन कुछ डरते हैं। इसीलिये राजदण्ड मुसलमानोंके शरीरसे छूता हुआ हिन्दुओंके ठीक सिरपर कुछ जोरके साथ गिरता है।

इसी राजनीतिको कहते हैं-"दाईको मारकर बहूको सिखाना।" यदि दाईको कुछ अन्यायपूर्वक भी मारा जाय तो वह सह लेती है।